जैसे जैसे समाज उचाइयो की तरफ बढ़ रहा है वैसे वैसे गन्दी राजनीति की घोर अँधेरी चादर हम ओढ़े चले जा रहे है.... आज इसका प्रकोप ना सिर्फ संसद में अपितु फिल्मो में भी दिनों दिन बढ़ रहा है।
एक समय था जब फिल्मो को मात्र मनोरंजन का साधन माना जाता था , लेकिन अगर हाल ही में आई दो फिल्म 'थ्री इदीअत' और 'माय नेम इज खान' की बात करे तो उसपे की गई ओछी राजनीति का साफ़ पर्दा उठता है ।
जहाँ आमिर खान की ३ इदिअत में चेतन भगत द्वारा किया गया हस्तछेप उनकी आने वाली किताबो के लिए वरदान साबित हुआ वही शाहरुख़ खान की हालिया फिल्म भी उनके बयान के कारण आनन् फानन में बहु चर्चित हो गयी ।
कही न कही इसमें स्वार्थ की बू आती है। मामला स्पष्ट हैं की चेतन भगत ने जो कयास बाद में लगाये है वो कयास वो फिल्म के रिलीस होने के पहले भी लगा सकते थे । आम जनता को इसका नतीजा तक सही से मालूम नही हो पाया। हाँ ! इतना जरूर पता चला की चेतन भगत की कहानियो में दम होता है।
वही बात करे अगर खान की तो उनका बयान भी बचकाना लगता है॥ अगर उन्हें पाक खिलाडी सच में पसंद थे तो ले लिया होता अपने नाईट राइडर में लेकिन उन्होंने ऐसा नही किया । मैं मानता हूँ की पाक खिलाड़ ओहेलना के लायक नही है। लेकिन खान पे जो दवाव पहले था वो अचानक कहा चला गया। अपनी गलती को उन्होंने नही बताया की वो किसके दवाव में थे हालाँकि ये कथित दवाव तो सब पे था लेकिन किसी ने इसे तुल देना वाजिब नही समझा फिर अंत में खान ही क्यों?
शिवसेना का विरोध भी मुझे महज एक ओछापअन लगता है क्योकि अगर उन्हें देश की इतनी ही फिकर है तो कुछ नही तो शांत तो बैठ सकते है। आज उनके जैसे सम्प्रदैक लोगो से देश खुद जूझ रहा है।
कुल मिला के आज समाज में हमारे चारो ओर ऐसी परिस्थितिया है की हम खुल के साँस भी नही ले सकते है। मेरा उन सब लोगो से विनम्र निवेदन है की देश के विकाश में सहयोग दे न की आंतरिक कलह se माँ भारती के सीने पे कलाह के बिज बोये ।