Wednesday, December 21, 2011

सोशल मीडिया की निगरानी

अमरजीत चौधरी

सोशल मीडिया ने भारतीय मीडिया जगत में अपना एक स्थान बना लिया है। कभी-कभी तो लगता है कि वह पारंपरिक मीडिया पीछे छोड़ चुकी है और जल्द ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के स्वप्निल संसार को छोड़ कर आगे निकल जायेगी।
उसकी यह संभावना और लोगों तक सीधी पहुंच केवल सत्ताधारी ही नहीं बल्कि उन लोगों को चिंतित किये हुए है जो जनमत को अपनी ताल पर थिरकते देखना चाहते हैं। लोकतंत्र होते हुए भी भारत में अंग्रेजों के बनाये कानूनों की आड़ में सूचनाओं को छापने और छिपाने का खेल आजादी के बाद भी दशकों तक चला है।
जूलियस असांजे ने सूचनाओं को फाइलों की गिरफ्त से निकाल कर लोगों तक पहुंचाने का काम किया तो तमाम सरकारें उसके खिलाफ खड़ी हो गयीं। लेकिन असांजे के इस दुस्साहस ने गली-मुहल्ले में ऐसे किशोरों की फौज खड़ी कर दी जो अपने हाथ लगी ननिहीं सी जानकारी को भी इंटरनेट के माध्यम से दुनियां भर में बांटने को मचल उठे।
इस बेचैनी को निकलने का मार्ग मिला जब वेब मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ। सबसे पहले पत्रकारों की नयी पीढ़ी ने इसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और बाद में बड़ी संख्या में नागरिक भी इससे जुड़ते गये। पहले ब्लॉग और उसके बाद ऑरकुट, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की असीम संभावनाओं के द्वार खोल दिये। बेहद कम समय में बहुत अधिक लोकप्रियता पाने का कारण था इसका सस्ता और सर्वसुलभ होना। साथ ही यह ऐसा माध्यम बन गया जिसमें बतकही के लिये पूरी गुंजाइश थी, भाषा और भावों का, छन्द और व्याकरण का कोई बन्धन न था।
मीडिया में छपने वाले आंकड़ों में देश की सुनहरी तस्वीर और मजबूत होती अर्थव्यवस्था की खबरे छपती थीं तो मंहगाई से जूझ रहा नागरिक यह संदेह तो करता था कि कहीं-न-कहीं दाल में काला है किन्तु कसमसाने के अलावा कुछ भी कर सकना उसके लिये असंभव था। लेकिन सोशल मीडिया में अपनी बात कहने के साथ ही अपने विचार से सहमत लोगों को ढ़ूंढ़ निकालना भी अत्यंत सरल हो गया।
जल्दी ही राष्ट्रीय मुद्दों पर समान रूप से सोचने वाले लोगों की गोलबंदी होने लगी और सोशल मीडिया एक आंदोलन का आधार बन गया। सोशल मीडिया के माध्यम का उपयोग कर मध्य एशिया के देशों में परिवर्तन की जो लहर चली उसने दुनियां भर सरकारों को चौकन्ना कर दिया। भारत सरकार भी उस पर प्रभावी नियंत्रण की योजना बनाती इससे पहले ही अन्ना की टीम ने इसका पहला सफल प्रयोग किया। जंतर-मंतर पर अन्ना के पहले प्रदर्शन के बाद हुए रामदेव के आंदोलन को सरकार ने जिस तरह कुचलने की कोशिश की उससे रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन को धार मिली। रामदेव के समर्थकों पर हुई हिंसा के विरोध में सोशल मीडिया पर टिप्पणियों की बाढ़ आ गयी। यही बाढ़ बाद में अन्ना के समर्थन में तब्दील हो गयी।
अब जबकि अन्ना की टीम ने सरकार को दोबारा घेरने की कोशिश शुरू कर दी है, सरकार चाहती है कि सोशल मीडिया की मुश्कें कुछ इस तरह कस दी जायें ताकि आने वाले समय में वह अन्ना के लिये प्लेटफॉर्म न बन सके।
इसी कवायद का एक हिस्सा था संचार मंत्री सिब्बल द्वारा सोशल मीडिया साइट के संचालकों को बुला कर दी गयी कपिल सिब्बल की घुड़की। चिन्ता की बात यह है कि इन साइट संचालकों ने भारत में इसकी चर्चा भी नहीं की। न ही मंत्रालय के भीतर की हलचल सूंघने वाले खोजी खबरियों ने इसे छापा। वाशिंगटन पोस्ट में छपने के बाद भारत की मीडिया में इस पर बावेला मचा।
सोशल साइटों पर लगाम लगाने की सिब्बल की कोशिश को व्यक्तिगत प्रयास नहीं बल्कि सरकार की नीति ही मानना चाहिये। यद्यपि सिब्बल द्वारा उठाये गये प्रश्नों को भी महत्व दिया जाना चाहिये। उनके द्वारा उठाये गये नैतिकता और मूल्यों के सवाल नकार दिये जाने योग्य नहीं हैं और उन पर गंभीर चिंतन आवश्यक है। किन्तु यह कवायद तब अर्थ खो देती है जब लगता है कि यह सरकार की ईमानदार कोशिश के बजाय नागरिकों की जबान बंद करने की कोशिश अधिक है।
यदि सरकार को लगता है कि वह इसमें सफल हो सकेगी तो इसकी संभावना बेहद कम है। इसलिये नहीं कि पूरा देश अन्ना के समर्थन में आ खड़ा हुआ है अथवा मध्य एशिया के देशों की तरह क्रांति पर उतर आया है, बल्कि इसलिये, क्योंकि मीडिया और सरकार की लगातार बेरुखी के बाद आम नागरिकों के हाथ एक ऐसा माध्यम आया है जहाँ उनकी समस्याओं का हल नहीं है लेकिन कम से कम बिना किसी प्रतिबंध के अपनी बात कह सकने की आजादी तो है।

Tuesday, December 6, 2011

मल्टीब्रांड एफ़डीआई यानी चोर छिप गया भागा नहीं है!



अमरजीत चौधरी


ममता को पैकेज देकर जल्दी बिल्ली थैले से बाहर आ जायेगी। खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का भूत ममता की तृणमूल कांग्रेस के अड़ जाने से फिलहाल छिप गया है लेकिन यह मानना खुद को धेखा देना होगा कि यह हमेशा के लिये भाग गया है। दरअसल कम लोगों को यह अंदर की बात पता है कि जून में जब वित्तमंत्रि प्रणव मुखर्जी अमेरिका गये थे तो वहां अमेरिकी विदेशमंत्री टिमिथी गैटनर ने उनसे कहा था कि हम बैंकिंग, इंश्योरेंस और मल्टी ब्रांड रिटेल में भारत को तेजी से आगे बढ़ता देखना चाहते हैं। मज़ेदार बात यह है कि आज जो भाजपा विपक्ष में होने की वजह से यूपीए के इस क़दम का जमकर विरोध कर रही है वह 1998 से 2004 के बीच एनडीए सरकार के दौरान बढ़ चढ़कर इस तरह की आर्थिक नीतियों का खुलकर समर्थन करती रही है। हालत यह थी कि 2002 में एनडीए की वाणिज्य और उद्योग मंत्री मुरासोली मारन ने ग्रुप आफ मिनिस्टर्स के सामने एक नोट पेश किया था जिसमें रिटेल में शत प्रतिशत विदेशी निवेश की सिफारिश की थी। इतना ही नहीं 2004 के चुनाव में एनडीए के विज़न डाक्यूमेंट में भी रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात मौजूद थी। सच यह है कि उदारीकरण में जब एक ओर हमारी मल्टीनेशनल कम्पनियां विदेशों में जाकर रिटेल कारोबार में सिक्का जमा रही हैं तो हम अपने देश के दरवाजें दूसरों के लिये कैसे बंद रख सकते हैं? दरअसल विदेशी कम्पनियां वालमार्ट, कार्फू और टेस्को दूसरे देशों में जो गुल खिला चुकी हैं उनसे डर लगना नेचुरल ही है। यह ठीक है कि कुछ समय तक किसान को अपनी उपज का बढ़ा हुआ दाम और उपभोक्ता को सस्ता सामान मिलेगा लेकिन यहीं एक पेंच है कि बाद में प्रतियोगिता में अन्य देसी कम्पनियों और व्यापारियों को ठिकाने लगाने के बाद इन भीमकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मोनोपोली हो जाना तय है। जहां 2020 तक 80 लाख से एक करोड़ नये रोज़गार पैदा करने का दावा किया जा रहा है वहीं यह भी निश्चित है कि 6 करोड़ फुटकर दुकानदारों को यह फैसला निगल भी जायेगा। हमारे यहां कुल रिटेल का 60 प्रतिशत हिस्सा खाने पीने का सामान है जो लगभग 11000 अरब रुपये का होता है। एक सर्वे बताता है कि महानगरों में लगभग 68 प्रतिशत अनाज दाल मसाले और 90 प्रतिशत फल सब्ज़ियां दूध मांस और अंडे छोटी दुकानों से ख़रीदे जाते हैं। मीडियम क्लास सिटी में यह आंकड़ा क्रमशः 79, 92, और 98 है। इसका मतलब यह है कि पहले से देश में मौजूद रिलायंस स्पेंसर और बिग बाज़ार जैसे बड़े देसी डीलर भारतीयों को अपनी तरफ नहीं खींच पाये हैं। इनका हिस्सा आज भी मात्र 2 प्रतिशत बना हुआ है। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि छोटा दुकानदार जहां औसत 280 मीटर की दूरी पर उपलब्ध है वहीं संगठित क्षेत्र के बड़े शॉपिंग माल डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर हैं। मल्टी ब्रांड रिटेल से महंगाई घटने का तर्क भी गले नहीं उतरता क्योंकि भारत में देसी मल्टी ब्रांड रिटेलर आने के बावजूद पिछले साल उल्टे महंगाई और बेकाबू हो चुकी है। भंडारण और आपूर्ति का ढांचा बने बिना किसानों को भी इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा। देखने की बात यह होगी कि क्या भारत जैसे विशाल बाज़ार में मल्टी नेशनल कम्पनियों असंगठित दुकानदारों से प्रतिस्पर्धा करने को प्रबंधन और भंडारण में भारी पूंजीनिवेश करने को तैयार होती हैं या नहीं क्योंकि यह तो तय है कि अब चाहे जितना शोर मचाया जाये लेकिन जब देश ने एक तरह से शराब जैसी पूंजीवादी नीति स्वीकार कर ही ली है तो उसका नशा हुए बिना तो नहीं रहेगा। हमारी सरकार पर ये लाइनें कितनी सटीक बैठती हैं-
फूल था मैं कांटा बनाकर रख दिया,
और अब कहते हैं कि चुभना छोड़दे।

Friday, December 2, 2011

गुजरे पल की कसक


यूँ सोचता हूँ ..
कि पल जो गुजरतें हैं

वो मेरे थे कभी

अब भी आता हुआ
पल
मेरा ही है
फिर ...
क्यूँ तलाशता हूँ

गुजरे पल को अक्सर

उस फिजा को
उस महक को

उस रवानगी को

जो हमने बनाई थी

ये बात, उफ़ ये बात
बीतते पल के साथ महसूस होती है
कि पल-पल की खासियत है अपनी
मगर फिर भी ...
गुजरे पल की कसक
आने वाले पल से ज्यादा होती है