Friday, August 20, 2010

एक अनजाना सा ख्वाब देखा है...


आज मेरी सुबह का सूरज कहीं खो गया है....भीषण गर्मी के इस आग उगलते धूप के उजाले में भी आज मुझे...गुमनामी का अंधेरा और जीने का डर अनायास ही सता रहा है...बचपन की वो यादें और उन यादों के पीछे छिपे इरादों को याद कर के दिल रोना चाहता है...लेकिन मां कि आंचल का सहारा ना मिलने के कारण ये आंखे भी बेबस होकर चुप्पी साध चुकी है...अजीब सी इक हलचल मची है दिल में....शायद कोई आने वाला है मेरी जिंदगी में...या फिर कोई बिछड़ने वाला है मुझसे...मैंने तो एक हसीन से ख्वाब को पाल रखा था दिल में...फिर ऐसी घबराहट क्यों जो दिल को कचोट रही है ?? क्या मेरा ख्वाब अब भी ख्वाब ही रह जाएगा? कल रात का घनघोर अंधेरा मैं कैसे भूल पाउंगा...हर रोज की तरह मेरी तन्हाई और परछाईं मेरे साथ थी...लेकिन खुद की परछाई के साथ चलने में मैं डर क्यों रहा था ? क्या अब मेरी तन्हाई ही मेरी अपनी रह गई है या फिर उसका भी साथ छूटने वाला है...अजीब सा सवाल है मन में...लेकिन नादान हूँ मैं जो अपने ही सवालो से उसका जवाब मांगने कि जिद्द कर रहा हूँ पता है मुझे कि ये महज एक पागलपन है लेकिन किसी और से जवाब मांगने के ख्याल से डर लग रहा है मुझे...लेकिन उसी अंजाने ख्वाब को दिल से याद करके एक अंजानी सी हिम्मत भी आ जाती है मुझमें...जो अब भी मेरे उस ख्वाब को जिंदा रखे हुए है कि मेरी जिंदगी में कोई आने वाला है जो मुझे सबसे प्यारा होगा....काश मैं उस पल को महसुस कर पाता और जी पाता...आज के अकेलेपन से एक बात तो मैंने सीख ली है कि जिंदगी एक अंधेरी गुफा के समान है लेकिन एक छोर पर उजाले कि एक किरण हमेशा हमारा इंतजार कर रही होती है...फिर भी हम बेबस होकर अपने ही सवालों के उमड़ते-घुमड़ते बादलो में गोते लगाते रहते हैं...हमें लगता है कोई दूर समंदर से एक सीप हमारे लिए एक मोती लेकर आएगा जो हमारे जिंदगी को चमकाएगा...लेकिन ये एक महज ख्वाब है..और झूठ बोलते हैं वो लोग जो कहते हैं कि हर सपना सच और अपना होता है....सच कहूँ तो ख्वाब तो सिर्फ टूटने और इंसानो के दिल को तोड़ने का जरिया मात्र है...इंसान हर सुबह कि किरण के साथ ख्वाब देखता है और हर ढ़लते सूरज के किरण उसकी ये उम्मीदों का गला घोंट देती है...इसलिए झूठे हैं वो जो कहते हैं कि ख्वाब रात के आगोश में पलते हैं...मैने तो हर उजाले में एक अनजाना सा ख्वाब देखा है...

Saturday, August 14, 2010

दी थी इतनी कुर्बानिया फिर भी भारत आजाद ना रहा॥

दुनिया में अब इंसानियत का ताज ना रहा..
दी थी इतनी कुर्बानिया फिर भी भारत आजाद ना रहा..
घोटालों नें सेंध लगा दी..
भ्रष्टाचार का साया है..
फसाद के कर्कश स्वर से...
मधुर युवा का कोई आवाज ना रहा...
दुनिया में अब इंसानियत का ताज ना रहा...
दी थी इतनी कुर्बानिया फिर भी भारत आजाद ना रहा॥
दुनिया भर की नजरे हम पर...
कुंठा से इतराती है...
हम है इतने लाचार कि अब...
दुश्मनी धुंधली पड़ जाती है...
जुवान पर तो 'जय हो' है पर...
दिलो में माँ का परवाज़ ना रहा...
दुनिया में अब इंसानियत का ताज ना रहा...
दी थी इतनी कुर्बानिया फिर भी भारत आजाद ना रहा...
सोने की चिड़िया थें पहले...
ठाठ से राज करतें थें महलें...
दिल में झुठा प्यार है अब भी....
पर एहसान किसी का अब उधार ना रहा...
दुनिया में इंसानियत का नाम ना रहा...
दी थी इतनी कुर्बानिया फिर भी...
अपना भारत अब आजाद ना रहा....

बस खिंची गई एक संकड़ी सी LOC है

63वें स्वतंत्रा दिवस की हार्दिक शुभकामना के साथ बहारो के बोलते शब्द...........


बहारें लौट के आई है
देखने ज़लवा तेरा
लेकिन उन्हें क्या पता
कि भारत-पाक अब एक नही
कहानी 1947 के अगस्त की है
ज़ख्म 2010 के अगस्त तक वही है
जुदा ना रुप-रंग ना रोश्नी है
बस खिंची गई एक संकड़ी सी LOC है
ये वही पाक है
जो हिन्दुस्तान था कभी
लिया स्थान
पाकिस्तान बना लिया
मगर क्या चॉद-सितारा
जो पहचान बनी है जिसकी
कभी मांगा हक उससे
अपने यहां रहने की
बड़ा अफसोस है
इन बदमस्त हवाओं को
सरहदो से नही रिश्ता है फिर भी
अमन और सितम दोनो में कितना फ़र्क है
महसुस करती है ये हवाएं एक साथ ही
कभी इन हवाओं में गुलामी की जंजीर थी
बहारों के खुश्बुओं में आजादी की दुआ रहती थी
अब तो है स्वराज देश में
मैं बहार हूं
झुमना चाहता हूं
मगर लाहौर से कश्मीर आते-आते रुक जाता हूं
मुझे भी झुमने दो
बहार बनके घूमने दो
रोक दो दहशती कारनामो को
बहार लौट ना पाये इस दफ़ा
बिन देखे ज़लवा तेरा
बहारें लौट के आई है
देखने ज़लवा तेरा
लेकिन उन्हे क्या पता
कि भारत-पाक अब एक नही

Friday, August 13, 2010

मीडिया इतनी डरी सहमी क्यूं है ?

मीडिया पे हमेशा वाद-विदाद चलता रहता है । खासकर मैन स्टीम मीडिया को लेकर बहस का सिलसिला तो कभी थमता ही नही । मीडियाकर्मी अपने आप को लोकतंत्र का प्रहरी मानते हैं । उन्हे लगता है कि सवाल पुछना ही ‌उनकी फितरत है । चाहे संसद का गलियारा हो या फिर सड़क का चौक-चौराहा । मीडिया लगातार हशिये पर जा रही है । इसके पिछे एक खास वज़ह भी है । एक तो मीडिया अपने मापांक के पैमाने पे खड़ा उतरने के लिए बेकरार रहता है । जिसे मीडिया के ही शब्दो में टीआरपी कहते है । यानि टेलिविजन रैंटिंग प्वाइन। तो वहीं दूसरी तरफ बाजार और लोगो की मांग का बहाना बना कर अपने पर उठ रहे सवाल को खारिज करता है । लेकिन इस बात की वास्तविकता ये नही है । सबसे पहले तो मीडिया में अब वो जजवा नही रहा । जिस जजवा के लिए मीडिया का निर्माण किया गया । हरेक मीडिया संगठन किसी ना किसी पॉलिशी के तहत कार्य करता है । और आप को बता दू कि जब तक कोई भी कर्मचारी इन पॉलिशियों से रु-ब-रु नही हो पाता है, तब तक वह उस संगठन के लिए बेकार जैसा रहता है । खैर इन पॉलिशियों को समझने में ज्यादा समय नही लगता है । लेकिन जिस बात को लेकर आज का मंथन है वो ये कि आखिर क्यो मीडिया इतनी डरी सहमी है........ । क्यो आज मीडिया अपना दर्शक वर्ग नही बना पा रही है....... । क्यो मीडिया को क्लाइमेक्स की जरुरत है ......क्यो मीडिया के चैनल हर खबर से अपने आप को स्थापित करना चाहता है ......क्यो मीडिया को ऐसा लगता है कि ब्रेक के बाद दर्शक उनके चैनल के साथ नही बने रहेगें .....क्यो कहा जाता आप बने रहे है ब्रेक के बाद भी......इन सब के पीछे जो एक तर्क कार्य करता कि मीडिया डरी सहमी हुई है । शायद यही वजह है कि प्राइम टाइम में बड़े-बड़े चैनल फिल्मो का प्रोमोशन करता है ।और एक दर्शक वर्ग बनाना चाहता है । लेकिन इतने से ही काम नही चल पाता है तो फिर धारावाहिको क्लाइमेक्स और कॉमेडी, गीत संगीत के कार्यक्रम को समाचार का रुप देकर परोसा जाता है । मीडिया के इन चैनलो के लिए भूत भी खास तरह के न्यूज बनाता है खासकर तब जब प्रतिद्वंदी चैनल के हाथ कोइ पुखता समाचार हो । ऐसे हालात में सवाल ये उठता है कि मीडिया अपने गिरते स्तर के लिए किसको जिम्मेदार माने । उस मीडियाकर्मी को जो नये आते है और थके हारे से महसुस करते हैं । या फिर उन मीडियाकर्मीयों को जो मीडिया में कई दशक से कार्य कर रहें हैं । और कॉर्पोरेटरों के हित को देखते नीति का निर्माण करते हैं । सच्चाई ये है कि मीडिया खुद में एक ऐसा बाजार बन गया है जहां हर कुछ बेचा जाता है । खासकर समाचारों को बेचना यहां मुख्य रुप से होता है । समाचारो को बेचने के लिए एक खास अंदाज एक खास आवाज और एक खास विषय चुना जाता है । इसके कई उदाहरण भी है । जैसे किसी मुद्दा को बहस बना देना या फिर किसी बहस को मुद्दा के तौर पर पेश करना । आये दिन जिस तरह से बॉलिबु़ड वाले मीडिया चैनल को फिल्मो के प्रोमो के लिए इस्तमाल कर रहें हैं लगता है कि नही है कि ये हिन्दुस्तान का न्यूज चैनल है । न्यूज चैनल का ये MTV रुप लोगो को चैनल और इन्टरटेनमेंट चैनल के फर्क को खत्म लगभग खत्म कर दिहा है । शायद यही वजह है कि मंहगाई, अशिक्षा बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, गांव-देहात , और प्रशासनिक अन्याय कभी मुख्य खबर नही बन पाती है ।