Tuesday, June 29, 2010

हम चले कॉलेज जब

इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब


चॉद रौशन हुआ
हम चले कॉलेज जब
कुछ मिला,कुछ मिल गया
हम चले कॉलेज जब

बेफ्रिक, बेशबरी का आलम
और एहसासों का दौर
कितने ख्वाबों का सफर था
हम चले कॉलेज जब

सामने आये जो तुम
हम सभंल पाये नही
खो गया शायद था कुछ
हम चले कॉलेज जब

दास्तां तो थी अधूरी
जाने कितने कारवां के
बस सफर बढ़ने लगी थी
हम चले कॉलेज जब

दिप का अगर नाम लेलू
बदनामी रौशन की होगी
लौ बन के जल लिये
हम चले कॉलेज जब

लाइब्रेरी भी सुना हुआ था
खाली-खाली लग रहा था
नजरो में कोइ बस चुका था
हम चले कॉलेज जब

साथ दोस्तो का रहता
तन्हा-तन्हा फिर क्यूं लगता
ऐसी हालत पहली दफा था
हम चले कॉलेज जब

घर से आया सोच के
पढ़ना है जी-जान से
जान से ही जी लगा था
हम चले कॉलेज जब

कुछ चुनीन्दे है फ़साने
ख्वाब और मेरे दरमिंया के
यूं ही नही लिख दिया हुं
हम चले कॉलेज जब
 
इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब

Friday, June 11, 2010

काश मैं गुलाम होता....

दुनिया आज जिस रफ़्तार से उचाइयो को चूमने को बेताब हो रही है ऐसा लगता है मानों की एक समय वो उसकी आगोश में ही पहुँच जाएगी...
रफ़्तार के इस दौड़ में सब एक दुसरे को पीछे छोड़ना चाहते है...रफ़्तार के इस दौड़ में किसी को किसी की फ़िक्र नही है...
ऐसे आलम में हमारा भारत भी पीछे नही छूटा है...वो भी इस रफ़्तार से रफ्तार मिलाये हुए है....हम भारतीय तो वैसे भी जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान के नारे से प्रेरित लोग है...हमारे और सफलता के बीच तो वैसे भी गहरा सम्बन्ध है....या यूँ कहे तो हम एक दुसरे के पूरक बन गये है.... आजादी के बाद जैसे जैसे दिन बीतते गये वैसे वैसे हमारे पंख फैलते जा रहे है....आज हमारी उड़ान का लोहा तो दुनिया मानती है...
लेकिन सवाल ये उठता है की इतने विकाश के बाद भी हम वो सोने की चिड़िया क्यों नही बन पाए जो हम कई दसक पहले हुआ करतें थे...आज हम जो है उसका सपना न तो सावरकर ने देखा था न ही गाँधी ने...!
फिरंगियो से आजादी तो हमने 63 साल पहले ही पा लिया था....लेकिन सच मायने में हम आज भी गुलाम बने हुए है.....आज हम जहाँ आतंकवाद और पूंजीवाद के रूप में बाहरी शक्तिओ के सामने घुटने टेक चुके है वही नक्सलवाद और अलगाववाद हम पर आंतरिक रूप से हावी हो गया है..... आजादी के लिए दी गयी जानें हमें याद है मगर वर्तमान में जारी उपरोक्त वादों ने हमसे कितनी कुर्बानिया ली है शायद किसी ने गौर नही फरमाया....
आज हम हर तरफ से बर्बादी के मंजर से घिर चुके है....लेकिन रफ़्तार से कोई समझौता करने को तैयार नही है...जिन्दगी की कीमत तो हमारे देश में इतनी सस्ती हो गयी है की हर तरफ बस खरीदार ही नजर आते है हम कब किसके हाथो बिक जायेंगे कुछ पता नही...
शायद अच्छी तो गुलामी की वो बेरिया थी जिनसे लिपट कर माँ भारती आंशु तो बहा पा रही थी...लेकिन आज तो उसकी आबरू पे ही बन आई है...और अपनी माँ के आबरू से बढ़ कर किसी लाल के लिए कुछ नही हो सकता...
इसमें कोई दो राये नही की हमारा भारत महान है लेकिन आज ये खुद से परेशां है...मुझे इस बात को कहने में तनिक भी अतिश्योक्ति नही हो रही है की आज मुझे फिर से गुलामी की जंजीर मंजूर है लेकिन माँ भारती क सिने में चोट और गद्दारी मैं नही सह पाऊंगा...

जय हिंद
जय माँ भारती