एक सचेतन चेतना
बुद्धि,विवेक और तृष्णा
ज्ञान के भवर में भी
रहे ब्याकुल,विचलित दोगुना
पथ के निर्माण में
अहम् के अभिमान में
रूप की पहचान में
मनुष्य के अज्ञान में
हो एक सचेतन चेतना
बुद्धि,विवेक और तृष्णा
स्मरण में लक्ष्य हो
जाग्रति प्रत्यक्ष हो
स्वप्न का भी तथ्य हो
न हो कोई विडंबना
हो एक सचेतन चेतना
बुद्धि,विवेक और तृष्णा
जीवन की क्षण भंगुरता
ब्रहमांड की है परंपरा
नव आश दीप्त, प्रदीप्त हो
रोशन सुबह का हो सिलसिला
bhut achha likha hai bloging me apka swagat hai
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