दुनिया आज जिस रफ़्तार से उचाइयो को चूमने को बेताब हो रही है ऐसा लगता है मानों की एक समय वो उसकी आगोश में ही पहुँच जाएगी...
रफ़्तार के इस दौड़ में सब एक दुसरे को पीछे छोड़ना चाहते है...रफ़्तार के इस दौड़ में किसी को किसी की फ़िक्र नही है...
ऐसे आलम में हमारा भारत भी पीछे नही छूटा है...वो भी इस रफ़्तार से रफ्तार मिलाये हुए है....हम भारतीय तो वैसे भी जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान के नारे से प्रेरित लोग है...हमारे और सफलता के बीच तो वैसे भी गहरा सम्बन्ध है....या यूँ कहे तो हम एक दुसरे के पूरक बन गये है.... आजादी के बाद जैसे जैसे दिन बीतते गये वैसे वैसे हमारे पंख फैलते जा रहे है....आज हमारी उड़ान का लोहा तो दुनिया मानती है...
लेकिन सवाल ये उठता है की इतने विकाश के बाद भी हम वो सोने की चिड़िया क्यों नही बन पाए जो हम कई दसक पहले हुआ करतें थे...आज हम जो है उसका सपना न तो सावरकर ने देखा था न ही गाँधी ने...!
फिरंगियो से आजादी तो हमने 63 साल पहले ही पा लिया था....लेकिन सच मायने में हम आज भी गुलाम बने हुए है.....आज हम जहाँ आतंकवाद और पूंजीवाद के रूप में बाहरी शक्तिओ के सामने घुटने टेक चुके है वही नक्सलवाद और अलगाववाद हम पर आंतरिक रूप से हावी हो गया है..... आजादी के लिए दी गयी जानें हमें याद है मगर वर्तमान में जारी उपरोक्त वादों ने हमसे कितनी कुर्बानिया ली है शायद किसी ने गौर नही फरमाया....
आज हम हर तरफ से बर्बादी के मंजर से घिर चुके है....लेकिन रफ़्तार से कोई समझौता करने को तैयार नही है...जिन्दगी की कीमत तो हमारे देश में इतनी सस्ती हो गयी है की हर तरफ बस खरीदार ही नजर आते है हम कब किसके हाथो बिक जायेंगे कुछ पता नही...
शायद अच्छी तो गुलामी की वो बेरिया थी जिनसे लिपट कर माँ भारती आंशु तो बहा पा रही थी...लेकिन आज तो उसकी आबरू पे ही बन आई है...और अपनी माँ के आबरू से बढ़ कर किसी लाल के लिए कुछ नही हो सकता...
इसमें कोई दो राये नही की हमारा भारत महान है लेकिन आज ये खुद से परेशां है...मुझे इस बात को कहने में तनिक भी अतिश्योक्ति नही हो रही है की आज मुझे फिर से गुलामी की जंजीर मंजूर है लेकिन माँ भारती क सिने में चोट और गद्दारी मैं नही सह पाऊंगा...
जय हिंद
जय माँ भारती
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