Friday, May 24, 2013

आकाश का सूनापन...



अक्सर गर्मी में जंगलों को जलते तो सुना है , लेकिन कभी जंगलों को उनकी अपनी ही छाँव में जलते  देखा है? जब जंगल खुद अपनी ही छाँव में जल उठे तो कैसा अजीब लगता होगा न ...  ये तो वही बात हुई कि सागर एक दिन खुद में ही डूब जाए और शिकायत भी करे कि वो प्यासा  है| जिस सागर में  दुनियाँ जहान की मीठी  नदियाँ आकर मिलती हैं| वो भला कैसे प्यासा हो गया? इसी तरह,  जो जंगल मनुहार कर के सावन को बुलाते हैं, और धरती की प्यास बुझाते हैं| जो अपने  हरे भरे वृक्षों की छाँव में पंथियों और पंछियों  को आश्रय  देते हैं | वो जंगल उसी छाँव  में  कैसे जलने लगते  है?

दरअसल सभी के अपने-अपने दुःख और अपने-अपने सुख  हैं| जंगल में भटकते हुए हिरन जिस खुशबू  से  परेशान है | वो उसी की कस्तूरी है उसे कौन बताये ? चाँद , जो हमेशा से सुन्दरता और प्रेम का प्रतीक बना  बैठा है| उसके पास  दर्द के गहरे स्याह  गड्डे है जिसे कोई प्रेमी देख  नहीं पाता|  सूरज की अपनी पीड़ा है सारे ब्रम्हांड का स्वामी है, जो समूची धरती को जीवन देता है| उसकी उष्मा और तपिश  इतनी की कोई  समीप  जाना  ही नहीं  चाहता | सूरज अकेले ही जलता रहता है कोई उसके संग नहीं क्यों? सावन  के अपने दुःख की धरती की प्यास बुझाते-बुझाते वो कितना प्यासा हो गया| कोई नहीं जानता क्यों? धरती के अपने प्रश्न कि सदियों से सहते-सहते थक गयी | उसके पुत्र  माँ-माँ  कह कर उसे उलीचते रहे और किसी ने भी उसके सीने पर पड़ी  दरारों को गिना क्यों नहीं?

आकाश का अपना अलग सूनापन है- कोई तारे उधार ले गया| कोई चाँद माँग कर ले गया| कोई आया  तो मेघ चुरा ले गया तो कोई काली  घटा को छीन के ले गया | आकाश फिर खाली हो गया क्यों ?

हमारे जीवन में भी तो यही होता हैं ना | दुनिया के लिए जीने वाले, दुनिया के दर्द को गले लगाने वाले | दुनिया के लिए बहने वाले, महकने वाले, खिलने वाले, खुशबू बिखेरने वाले, रोने वालों को अपना कंधा देने वाले, दूसरों  के आँसू पोछने  वाले, दूसरों के जीवन के उलझे हुए धागों को सुलझाने वाले क्यों एक दिन   उदास हो जाते हैं दुखी हो जाते हैं?

ये जंगल खुद अपनी छाँव  में क्यों जलने लगते हैं ? रूह तो उनकी भी होती है ना जो दूसरे को रूहानी सुकून देते है | प्यास तो उनकी भी होती है ना जो दूसरों को सावन देते हैं | सागर भी तो, चाहता है की कोई मीठी गागर उसके खारेपन को ख़तम कर दे | कोई घटा आकाश के सूनेपन को भर दे| तो चलिए ना किसी सागर की गागर बन जाए | किसी आकाश की  घटा किसी धरती के सूखे  टुकड़े पर चलो कोई सावन  रख दें |

चलिए ये पंक्तियाँ  सुनिए:

"बादलों का नाम ना हो ,अम्बरों के गाँव में
जलता हो जंगल खुद अपनी छाँव में
यही तो है मौसम, आओ तुम और हम
बारिश के नगमे गुनगुनाएं
थोड़ा सा  रूमानी हो जाएँ
दर्द को बांसुरी  बनाए "

तो, आईये हम अपने दर्द को अबकी बार बाँसुरी बना लें| किसी जंगल को अपनी हीं छाँव में जलने से बचा लें... (साभार - ममता व्यास)

Wednesday, October 24, 2012

“दिल, दिमाग और दवात"

तुम्हारे गज़ल से मुखरे पर बिछी रौशन मुस्कान का मैं कायल हूं । समुंद्र सी गहरी, झील सी प्यारी, रात सी काली, बोलती आंखों की जुबान का मैं कायल हूं । मैं गुलाब की पत्तियों सी सजी, आफताब की ओस से ज़री, प्रभा की पहली रोशनी सी लग रही, तुम्हारे होठों के सुर्ख मिस्ठान का कायल हूं । पलकों की भूलभुलइयां, गालों पर बनती कुइयां के दिदार का मैं कायल हूं । तुम यकिन नहीं मानोगी, तुम्हारी गेशुओं से उलझ के निकली हुई मदमस्त हवाओं में वासंतिक लालिमा होती है, सावन की भीगी-भीगी खूशबू होती है, माघ का ठंडापन और जयेष्ठ का प्यास होता है, चंदन की महक, चिड़ियों की चहक और न जाने कौन-कौन से तत्वों का संगम होता है । मैं इस संगम के व्याख्यान का कायल हूं ।
“दिल, दिमाग और दवात के संगम की उपज”

हवाओं का आसियां

धरती और आसमान के बीच हवाओं का आसियां होता है । तितली, भंवरे, जुग्नू आज सब परेशान है । इंसान पुतला फूंक रहा हैं, आज रावण का कल मनमोहन का परसो मायावती, नीतीश, गडकरी और ना जाने कौन-कौन । रावण खुशी-खुशी फूंका जा रहा हैं, लेकिन नेताओं को फूंकने पर क्फर्यू लग जाता है । हवाओं के आसियां पर कफर्यू नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन ज़हर तो हवाओं में भी घोला जा सकता है । मत घोलो ज़हर की आसियां हवाओं का भी उजर जायें और तितली, भंवरे, जुग्नू सब परेशान रहे ।।

Saturday, January 7, 2012

तुम इतने निर्दयी कैसे

तुम इतने निर्दयी कैसे

मेरे अँसुवन नैनों के नीर

दोनों मेरे हो के भी

सावन मोती बहतें हैं

निश्छल ह्रदय

व्याकुल मन मेरा

प्रीत की आस लगाये था

तुम मधुमास

बसंत तुम फागुन

सरसों फूल सुनहरी सी

ज्येष्ठ दोपहरी आग सा झुलसा

नियत तुम्हारी जो पढ़ ली

कुंठित प्रेम

कलंक की भाषा

अभिनव छवि दिखाई थी

तुम योवन भूख की माया

मेरा प्रेम विहंगम सा

रूप रतन सब तेरे तेज

मुझपे असर ना कर पाया

विचलित हूँ

की बिसराऊँ कैसे

पर विवस नहीं हूँ उस माया से

यह मोह भंग में कष्ट है

लेकिन

तुम इतने निर्दयी कैसे

Wednesday, January 4, 2012

मुस्लिम औरतों की दयनीय स्थिति : ज़रूरत है एक आपा की

अमरजीत चौधरी

महिलाएं चाहे जिस वर्ग, वर्ण, समाज की हों, सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं, दमित हैं, पीड़ित हैं। इनके उत्थान के लिए बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने महिलाओं के लिए आरक्षण की वकालत की थी। महात्मा गांधी ने देश के उत्थान को नारी के उत्थान के साथ जोड़ा था। मुस्लिम औरतों की स्थिति सबसे बदतर है।
पहली महिला न्यायाधीश बी फातिमा , राजनेता मोहसिना किदवई , नजमा हेपतुल्लाह , समाज-सेविका -अभिनेत्री शबाना आज़मी, सौन्दर्य की महारती शहनाज़ हुसैन, नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर, पूर्व महिला हाकी कप्तान रजिया जैदी, टेनिस सितारा सानिया मिर्जा, गायन में मकाम-बेगम अख्तर, परवीन , साहित्य-अदब में नासिर शर्मा, मेहरून निसा परवेज़, इस्मत चुगताई, कुर्रतुल ऍन हैदर तो पत्रकारिता में सादिया देहलवी और सीमा मुस्तफा जैसे कुछ और नाम लिए जा सकते हैं, जो इस बात के साक्ष्य हो ही सकते हैं की यदि इन औरतों को भी उचित अवसर मिले तो वो भी देश-समाज की तरक्की में उचित भागीदारी निभा सकती हैं।
लेकिन सच तो यह है कि फातिमा बी या सानिया या मोहसिना जैसी महिलाओं का प्रतिशत बमुश्किल इक भी नहीं है। अनगिनत शाहबानो, अमीना और कनीज़ अँधेरी सुरंग में रास्ता तलाश कर रही हैं।
भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 40 प्रतिशत है, इसमें मुस्लिम महिला मात्र 11 प्रतिशत है। हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने वाली इन महिलाओं का प्रतिशत मात्र 2 है और स्नातक तक का प्रतिशत 0.81
मुस्लिम संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मुस्लिम लड़कों का अनुपात 56.5 फीसदी है, छात्राओं का अनुपात महज़ 40 प्रतिशत है। इसी तरह मिडिल स्कूलों में छात्रों का अनुपात 52.3 है तो छात्राओं का 30 प्रतिशत है।
अनपढ़ रहकर जीना कितना मुहाल है, ये अनपढ़ ही जानते हैं। पढ़े-लिखों के बीच उठने-बैठने में, उनसे सामंजस्य स्थापित करने में बहुत कठिनाई दरपेश रहती है। मुस्लिम औरतों का इस वजह्कर चौतरफा विकास नहीं हो पाता। वो हर क्षेत्र में पिछड़ जाती हैं। प्राय:कम उम्र में उनकी शादी कर दी जाती है। शादी के बाद शरू होता है,घर-ग्रहस्ती का जंजाल। फिर तो पढ़ाई का सवाल ही नहीं। ग़लत नहीं कहा गया है कि पहली शिक्षक मां होती है। लेकिन इन मुस्लिम औरतों कि बदकिस्मती है कि वोह चाह कर भी अपने बच्चों को क ख ग या अलिफ़ बे से पहकई मुस्लिम देश ऐसे हैं जहां महिलाएं हर क्षेत्र में सक्रिय हैं। लेकिन विश्व की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले धर्म-निरपेक्ष तथा गणतंत्र भारत में उसकी स्थिति पिंजडे में बंद परिंदे की क्यों?
इसका जिम्मेदार मुल्ला-मौलवी और पुरूष प्रधान समाज ही नहीं स्वयं महिलाएं भी हैं जो साहस और एकजुटता का परिचय नहीं देतीं।
ज़रूरत है इक बी आपा की जिन्होंने अलीगढ में स्कूल कालेज की स्थापना की थी।चान नहीं करा पातीं।

Wednesday, December 21, 2011

सोशल मीडिया की निगरानी

अमरजीत चौधरी

सोशल मीडिया ने भारतीय मीडिया जगत में अपना एक स्थान बना लिया है। कभी-कभी तो लगता है कि वह पारंपरिक मीडिया पीछे छोड़ चुकी है और जल्द ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के स्वप्निल संसार को छोड़ कर आगे निकल जायेगी।
उसकी यह संभावना और लोगों तक सीधी पहुंच केवल सत्ताधारी ही नहीं बल्कि उन लोगों को चिंतित किये हुए है जो जनमत को अपनी ताल पर थिरकते देखना चाहते हैं। लोकतंत्र होते हुए भी भारत में अंग्रेजों के बनाये कानूनों की आड़ में सूचनाओं को छापने और छिपाने का खेल आजादी के बाद भी दशकों तक चला है।
जूलियस असांजे ने सूचनाओं को फाइलों की गिरफ्त से निकाल कर लोगों तक पहुंचाने का काम किया तो तमाम सरकारें उसके खिलाफ खड़ी हो गयीं। लेकिन असांजे के इस दुस्साहस ने गली-मुहल्ले में ऐसे किशोरों की फौज खड़ी कर दी जो अपने हाथ लगी ननिहीं सी जानकारी को भी इंटरनेट के माध्यम से दुनियां भर में बांटने को मचल उठे।
इस बेचैनी को निकलने का मार्ग मिला जब वेब मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ। सबसे पहले पत्रकारों की नयी पीढ़ी ने इसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और बाद में बड़ी संख्या में नागरिक भी इससे जुड़ते गये। पहले ब्लॉग और उसके बाद ऑरकुट, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की असीम संभावनाओं के द्वार खोल दिये। बेहद कम समय में बहुत अधिक लोकप्रियता पाने का कारण था इसका सस्ता और सर्वसुलभ होना। साथ ही यह ऐसा माध्यम बन गया जिसमें बतकही के लिये पूरी गुंजाइश थी, भाषा और भावों का, छन्द और व्याकरण का कोई बन्धन न था।
मीडिया में छपने वाले आंकड़ों में देश की सुनहरी तस्वीर और मजबूत होती अर्थव्यवस्था की खबरे छपती थीं तो मंहगाई से जूझ रहा नागरिक यह संदेह तो करता था कि कहीं-न-कहीं दाल में काला है किन्तु कसमसाने के अलावा कुछ भी कर सकना उसके लिये असंभव था। लेकिन सोशल मीडिया में अपनी बात कहने के साथ ही अपने विचार से सहमत लोगों को ढ़ूंढ़ निकालना भी अत्यंत सरल हो गया।
जल्दी ही राष्ट्रीय मुद्दों पर समान रूप से सोचने वाले लोगों की गोलबंदी होने लगी और सोशल मीडिया एक आंदोलन का आधार बन गया। सोशल मीडिया के माध्यम का उपयोग कर मध्य एशिया के देशों में परिवर्तन की जो लहर चली उसने दुनियां भर सरकारों को चौकन्ना कर दिया। भारत सरकार भी उस पर प्रभावी नियंत्रण की योजना बनाती इससे पहले ही अन्ना की टीम ने इसका पहला सफल प्रयोग किया। जंतर-मंतर पर अन्ना के पहले प्रदर्शन के बाद हुए रामदेव के आंदोलन को सरकार ने जिस तरह कुचलने की कोशिश की उससे रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन को धार मिली। रामदेव के समर्थकों पर हुई हिंसा के विरोध में सोशल मीडिया पर टिप्पणियों की बाढ़ आ गयी। यही बाढ़ बाद में अन्ना के समर्थन में तब्दील हो गयी।
अब जबकि अन्ना की टीम ने सरकार को दोबारा घेरने की कोशिश शुरू कर दी है, सरकार चाहती है कि सोशल मीडिया की मुश्कें कुछ इस तरह कस दी जायें ताकि आने वाले समय में वह अन्ना के लिये प्लेटफॉर्म न बन सके।
इसी कवायद का एक हिस्सा था संचार मंत्री सिब्बल द्वारा सोशल मीडिया साइट के संचालकों को बुला कर दी गयी कपिल सिब्बल की घुड़की। चिन्ता की बात यह है कि इन साइट संचालकों ने भारत में इसकी चर्चा भी नहीं की। न ही मंत्रालय के भीतर की हलचल सूंघने वाले खोजी खबरियों ने इसे छापा। वाशिंगटन पोस्ट में छपने के बाद भारत की मीडिया में इस पर बावेला मचा।
सोशल साइटों पर लगाम लगाने की सिब्बल की कोशिश को व्यक्तिगत प्रयास नहीं बल्कि सरकार की नीति ही मानना चाहिये। यद्यपि सिब्बल द्वारा उठाये गये प्रश्नों को भी महत्व दिया जाना चाहिये। उनके द्वारा उठाये गये नैतिकता और मूल्यों के सवाल नकार दिये जाने योग्य नहीं हैं और उन पर गंभीर चिंतन आवश्यक है। किन्तु यह कवायद तब अर्थ खो देती है जब लगता है कि यह सरकार की ईमानदार कोशिश के बजाय नागरिकों की जबान बंद करने की कोशिश अधिक है।
यदि सरकार को लगता है कि वह इसमें सफल हो सकेगी तो इसकी संभावना बेहद कम है। इसलिये नहीं कि पूरा देश अन्ना के समर्थन में आ खड़ा हुआ है अथवा मध्य एशिया के देशों की तरह क्रांति पर उतर आया है, बल्कि इसलिये, क्योंकि मीडिया और सरकार की लगातार बेरुखी के बाद आम नागरिकों के हाथ एक ऐसा माध्यम आया है जहाँ उनकी समस्याओं का हल नहीं है लेकिन कम से कम बिना किसी प्रतिबंध के अपनी बात कह सकने की आजादी तो है।

Tuesday, December 6, 2011

मल्टीब्रांड एफ़डीआई यानी चोर छिप गया भागा नहीं है!



अमरजीत चौधरी


ममता को पैकेज देकर जल्दी बिल्ली थैले से बाहर आ जायेगी। खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का भूत ममता की तृणमूल कांग्रेस के अड़ जाने से फिलहाल छिप गया है लेकिन यह मानना खुद को धेखा देना होगा कि यह हमेशा के लिये भाग गया है। दरअसल कम लोगों को यह अंदर की बात पता है कि जून में जब वित्तमंत्रि प्रणव मुखर्जी अमेरिका गये थे तो वहां अमेरिकी विदेशमंत्री टिमिथी गैटनर ने उनसे कहा था कि हम बैंकिंग, इंश्योरेंस और मल्टी ब्रांड रिटेल में भारत को तेजी से आगे बढ़ता देखना चाहते हैं। मज़ेदार बात यह है कि आज जो भाजपा विपक्ष में होने की वजह से यूपीए के इस क़दम का जमकर विरोध कर रही है वह 1998 से 2004 के बीच एनडीए सरकार के दौरान बढ़ चढ़कर इस तरह की आर्थिक नीतियों का खुलकर समर्थन करती रही है। हालत यह थी कि 2002 में एनडीए की वाणिज्य और उद्योग मंत्री मुरासोली मारन ने ग्रुप आफ मिनिस्टर्स के सामने एक नोट पेश किया था जिसमें रिटेल में शत प्रतिशत विदेशी निवेश की सिफारिश की थी। इतना ही नहीं 2004 के चुनाव में एनडीए के विज़न डाक्यूमेंट में भी रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात मौजूद थी। सच यह है कि उदारीकरण में जब एक ओर हमारी मल्टीनेशनल कम्पनियां विदेशों में जाकर रिटेल कारोबार में सिक्का जमा रही हैं तो हम अपने देश के दरवाजें दूसरों के लिये कैसे बंद रख सकते हैं? दरअसल विदेशी कम्पनियां वालमार्ट, कार्फू और टेस्को दूसरे देशों में जो गुल खिला चुकी हैं उनसे डर लगना नेचुरल ही है। यह ठीक है कि कुछ समय तक किसान को अपनी उपज का बढ़ा हुआ दाम और उपभोक्ता को सस्ता सामान मिलेगा लेकिन यहीं एक पेंच है कि बाद में प्रतियोगिता में अन्य देसी कम्पनियों और व्यापारियों को ठिकाने लगाने के बाद इन भीमकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मोनोपोली हो जाना तय है। जहां 2020 तक 80 लाख से एक करोड़ नये रोज़गार पैदा करने का दावा किया जा रहा है वहीं यह भी निश्चित है कि 6 करोड़ फुटकर दुकानदारों को यह फैसला निगल भी जायेगा। हमारे यहां कुल रिटेल का 60 प्रतिशत हिस्सा खाने पीने का सामान है जो लगभग 11000 अरब रुपये का होता है। एक सर्वे बताता है कि महानगरों में लगभग 68 प्रतिशत अनाज दाल मसाले और 90 प्रतिशत फल सब्ज़ियां दूध मांस और अंडे छोटी दुकानों से ख़रीदे जाते हैं। मीडियम क्लास सिटी में यह आंकड़ा क्रमशः 79, 92, और 98 है। इसका मतलब यह है कि पहले से देश में मौजूद रिलायंस स्पेंसर और बिग बाज़ार जैसे बड़े देसी डीलर भारतीयों को अपनी तरफ नहीं खींच पाये हैं। इनका हिस्सा आज भी मात्र 2 प्रतिशत बना हुआ है। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि छोटा दुकानदार जहां औसत 280 मीटर की दूरी पर उपलब्ध है वहीं संगठित क्षेत्र के बड़े शॉपिंग माल डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर हैं। मल्टी ब्रांड रिटेल से महंगाई घटने का तर्क भी गले नहीं उतरता क्योंकि भारत में देसी मल्टी ब्रांड रिटेलर आने के बावजूद पिछले साल उल्टे महंगाई और बेकाबू हो चुकी है। भंडारण और आपूर्ति का ढांचा बने बिना किसानों को भी इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा। देखने की बात यह होगी कि क्या भारत जैसे विशाल बाज़ार में मल्टी नेशनल कम्पनियों असंगठित दुकानदारों से प्रतिस्पर्धा करने को प्रबंधन और भंडारण में भारी पूंजीनिवेश करने को तैयार होती हैं या नहीं क्योंकि यह तो तय है कि अब चाहे जितना शोर मचाया जाये लेकिन जब देश ने एक तरह से शराब जैसी पूंजीवादी नीति स्वीकार कर ही ली है तो उसका नशा हुए बिना तो नहीं रहेगा। हमारी सरकार पर ये लाइनें कितनी सटीक बैठती हैं-
फूल था मैं कांटा बनाकर रख दिया,
और अब कहते हैं कि चुभना छोड़दे।

Friday, December 2, 2011

गुजरे पल की कसक


यूँ सोचता हूँ ..
कि पल जो गुजरतें हैं

वो मेरे थे कभी

अब भी आता हुआ
पल
मेरा ही है
फिर ...
क्यूँ तलाशता हूँ

गुजरे पल को अक्सर

उस फिजा को
उस महक को

उस रवानगी को

जो हमने बनाई थी

ये बात, उफ़ ये बात
बीतते पल के साथ महसूस होती है
कि पल-पल की खासियत है अपनी
मगर फिर भी ...
गुजरे पल की कसक
आने वाले पल से ज्यादा होती है

Monday, November 28, 2011

उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व घमासान

अमरजीत चौधरी
उत्तर प्रदेश राज्य में होने वाले विधानसभा के आम चुनाव वैसे तो हमेशा ही पूरे देश के लिए उत्सुकता का विषय बने रहते हैं। परंतु इस बार खासतौर पर इन चुनावों पर पूरे देश की नज़र टिकी हुई है। इसके कई कारण हैं। एक तो यह कि प्रदेश की राजनीति में यह पहला मौका था जबकि पिछले चुनावों में बहुजन समाज पार्टी अपने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई तथा इन दिनों अकेले दम पर अपना कार्यकाल पूरा कर रही है। लिहाज़ा देश की नज़र इस बात पर है कि ‘‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’’ की बात करने वाली बसपा तथा उसकी नेता एवं प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अपने उपरोक्त नारों पर अमल कर पाने में कहां तक खरी उतर पाई हैं।
और यह भी कि बहुजन हिताय की बात करते-करते सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय की बातें करने का उन्हें लाभ हुआ है या नुकसान यह भी आने वाला चुनाव ही तय करेगा। दूसरी ओर विपक्षी दलों में मची इस बात की प्रतिस्पर्धा पर भी सभी की नज़रें टिकी हैं कि आखिर कौन सा दल स्वयं को मुख्य विपक्षी दल के रूप में राज्य में स्थापित कर पाता है। फिलहाल चुनाव पूर्व गठबंधन के नाम पर सिवाय कांग्रेस व राष्ट्रीय लोकदल में हुए समझौते के अन्य किसी राजनैतिक दल के साथ किसी भी पार्टी के चुनाव पूर्व गठबंधन किए जाने का कोई समाचार नहीं है। परंतु चुनाव का समय नज़दीक आते-आते इस प्रकार के होने वाले किसी गठबंधन से इंकार भी नहीं किया जा सकता।
बहरहाल, चुनाव पूर्व जैसा कि होता चला आ रहा है सत्तारुढ़ दल अर्थात् बहुजन समाज पार्टी अपने तरकश के सभी तीर चलाने में मसरूफ है। पिछले दिनों बड़े ही आश्चर्यजनक तरीके से राज्य विधानसभा का एक दिन का सत्र बुलाकर चंद मिनटों में ही लेखानुदान पारित करा दिया गया तथा प्रदेश को चार भागों में विभाजित करने जैसा अति महत्वपूर्ण एवं अतिसंवेदनशील प्रस्ताव भी आनन-फानन में पारित कर राज्य के बंटवारे संबंधी गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी गई। इसके अतिरिक्त बहुजन समाज से पटरी बदलकर सर्वजन समाज की ओर रुख करती हुई बसपा ब्राह्मण मतों को आकर्षित करने के लिए एक बार फिर तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है।
इन सबके अतिरिक्त टिकट बंटवारे को लेकर भी पार्टी में भीषण घमासान की खबरें हैं। हालांकि अभी चुनाव आयोग द्वारा राज्य विधानसभा चुनाव के संबंध में न तो कोई तिथि घोषित की गई है न ही इस संबंध में कोई अधिसूचना जारी हुई है। परंतु अभी से लगभग सभी राजनैतिक दलों द्वारा अपनी-अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा किए जाने का काम शुरु कर दिया गया है। खबरों के अनुसार बसपा में लगभग तीन दर्जन विधायकों को पार्टी इस बार चुनाव मैदान में पुनरू उतारने नहीं जा रही है। ऐसे में ज़ाहिर है इनमें से अधिकांश विधायकों ने अभी से बागी तेवर दिखाने शुरु कर दिए हैं और ऐसे विधायक अब दूसरी पार्टियों की ओर देख रहे हैं।
ज़ाहिर है टिकट वितरण के इस वातावरण में एक बार फिर सौदेबाज़ी की भी पूरी खबरें आ रही हैं। समाचारों के अनुसार बसपा के जिन विधायकों को इस बार पार्टी के टिकट से वंचित रखा जा रहा है उससे दहशत खाए हुए अन्य पार्टी विधायक सभी शर्तों को पूरा कर टिकट लेने की जुगत में लग गए हैं। उधर कांग्रेस पार्टी हालांकि अपने युवराज राहुल गांधी को तुरुप के पत्ते के रूप में मुख्य चुनाव प्रचारक की हैसियत से मैदान में उतारकार पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की आस लगाए हुए है। परंतु हकीकत में कांग्रेस को राज्य में भारी गुटबाज़ी का भी सामना करना पड़ रहा है।
बड़े आश्चर्य की बात है कि अन्ना हज़ारे तथा बाबा रामदेव जैसे स्वयंभू भ्रष्टाचार विरोधी श्पुरोधा्य उत्तर प्रदेश से ही अपने भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का सार्वजनिक शंखनाद करने जा रहे हैं तो दूसरी ओर इन सबसे बेपरवाह राजनैतिक दल व इनके कुछ नेता टिकट वितरण जैसे सुनहरे अवसर को धन उगाही के सर्वोत्तम माध्यम के रूप में अपनाए जाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। इन घटनाओं को उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व मचे घमासान का मात्र श्रीगणेश ही समझा जाना चाहिए।

Saturday, November 26, 2011

ये मुस्कुराहट तो वो नही

ये तन्हाई कितनी प्यारी है

शायद मेरे महबूब से भी ज्यादा


ये ख़ामोशी कितना कुछ कहता है

शायद मेरा महबूब भी जो ना कह सका
इस आवारगी में भी कितना सुकून है

शायद सादगी जो ना कर सका
ये मुस्कुराहट तो वो नही

जिसके खिलते ही लव गुलाब बनते थे
ये आह्ट तो वो नही

जिसके सुनते ही दिल में चिराग चलते थे

ये तस्वीर बनावटी है
या फिर ...

बनावटीपन ही तम्हारी छवि है