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Wednesday, October 24, 2012

“दिल, दिमाग और दवात"

तुम्हारे गज़ल से मुखरे पर बिछी रौशन मुस्कान का मैं कायल हूं । समुंद्र सी गहरी, झील सी प्यारी, रात सी काली, बोलती आंखों की जुबान का मैं कायल हूं । मैं गुलाब की पत्तियों सी सजी, आफताब की ओस से ज़री, प्रभा की पहली रोशनी सी लग रही, तुम्हारे होठों के सुर्ख मिस्ठान का कायल हूं । पलकों की भूलभुलइयां, गालों पर बनती कुइयां के दिदार का मैं कायल हूं । तुम यकिन नहीं मानोगी, तुम्हारी गेशुओं से उलझ के निकली हुई मदमस्त हवाओं में वासंतिक लालिमा होती है, सावन की भीगी-भीगी खूशबू होती है, माघ का ठंडापन और जयेष्ठ का प्यास होता है, चंदन की महक, चिड़ियों की चहक और न जाने कौन-कौन से तत्वों का संगम होता है । मैं इस संगम के व्याख्यान का कायल हूं ।
“दिल, दिमाग और दवात के संगम की उपज”

हवाओं का आसियां

धरती और आसमान के बीच हवाओं का आसियां होता है । तितली, भंवरे, जुग्नू आज सब परेशान है । इंसान पुतला फूंक रहा हैं, आज रावण का कल मनमोहन का परसो मायावती, नीतीश, गडकरी और ना जाने कौन-कौन । रावण खुशी-खुशी फूंका जा रहा हैं, लेकिन नेताओं को फूंकने पर क्फर्यू लग जाता है । हवाओं के आसियां पर कफर्यू नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन ज़हर तो हवाओं में भी घोला जा सकता है । मत घोलो ज़हर की आसियां हवाओं का भी उजर जायें और तितली, भंवरे, जुग्नू सब परेशान रहे ।।

Saturday, January 7, 2012

तुम इतने निर्दयी कैसे

तुम इतने निर्दयी कैसे

मेरे अँसुवन नैनों के नीर

दोनों मेरे हो के भी

सावन मोती बहतें हैं

निश्छल ह्रदय

व्याकुल मन मेरा

प्रीत की आस लगाये था

तुम मधुमास

बसंत तुम फागुन

सरसों फूल सुनहरी सी

ज्येष्ठ दोपहरी आग सा झुलसा

नियत तुम्हारी जो पढ़ ली

कुंठित प्रेम

कलंक की भाषा

अभिनव छवि दिखाई थी

तुम योवन भूख की माया

मेरा प्रेम विहंगम सा

रूप रतन सब तेरे तेज

मुझपे असर ना कर पाया

विचलित हूँ

की बिसराऊँ कैसे

पर विवस नहीं हूँ उस माया से

यह मोह भंग में कष्ट है

लेकिन

तुम इतने निर्दयी कैसे

Friday, December 2, 2011

गुजरे पल की कसक


यूँ सोचता हूँ ..
कि पल जो गुजरतें हैं

वो मेरे थे कभी

अब भी आता हुआ
पल
मेरा ही है
फिर ...
क्यूँ तलाशता हूँ

गुजरे पल को अक्सर

उस फिजा को
उस महक को

उस रवानगी को

जो हमने बनाई थी

ये बात, उफ़ ये बात
बीतते पल के साथ महसूस होती है
कि पल-पल की खासियत है अपनी
मगर फिर भी ...
गुजरे पल की कसक
आने वाले पल से ज्यादा होती है

Monday, September 13, 2010

हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो

हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी कारवां हो
हम चाहते हैं हिन्दी जां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो



है जन से कहना, जनमत बनाना
हिन्दी को अपनी प्रतिष्ठा दिलाना
हम भारत के हैं, नये भारत बनाना
हिन्दी भाषा जन साधारण तक पहुचाना
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी हिन्दुस्तान हो



कठिनाईयों से भरी रास्ता हैं
हिन्दी का अभी जो दूर्दशा चल रहा है
बहुत सोचने की ये मंथना है
भारतीय हैं हम, फिर क्यूँ इंग्लिश यहां हैं
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो


परछाइयों में हमें है चलना
भूल के सब कुछ, रौशन हिन्दी को है करना
आओ मिलाओं मेरे हाथ से हाथ
हिन्दी पुछेगी फिर इंग्लिश से औकाद
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी हिन्दुस्तान हो


ये राष्ट्रभाषा हिन्दी हमारी
सत-सत नमन हम हैं तेरे आभारी
तुम अस्मिता हो मेरे देश की
तुम पिता हो मेरे संदेश की
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो

Wednesday, September 8, 2010

इश्क गर एहसास है

इश्क गर एहसास है
तो फिर तुम्हें क्यूं ना होता है
इश्क गर जज़बात है
तो फिर दिल से क्यूं ये होता है

हम तो पुरानी यादों में भी जी लें
दिल है कि देखते ही धड़क लेता है
अहसान मानो मेरे दिल का मेरे महबुब
दूर हो मेरी दुनिया से फिर भी
ख्वाब तेरा ही रात-दिन क्यूं ये संजोता है

इश्क गर एहसास है
तो फिर तुम्हें क्यूं ना होता है
इश्क गर जज़बात है
तो फिर दिल से क्यूं ये होता है

Saturday, August 14, 2010

बस खिंची गई एक संकड़ी सी LOC है

63वें स्वतंत्रा दिवस की हार्दिक शुभकामना के साथ बहारो के बोलते शब्द...........


बहारें लौट के आई है
देखने ज़लवा तेरा
लेकिन उन्हें क्या पता
कि भारत-पाक अब एक नही
कहानी 1947 के अगस्त की है
ज़ख्म 2010 के अगस्त तक वही है
जुदा ना रुप-रंग ना रोश्नी है
बस खिंची गई एक संकड़ी सी LOC है
ये वही पाक है
जो हिन्दुस्तान था कभी
लिया स्थान
पाकिस्तान बना लिया
मगर क्या चॉद-सितारा
जो पहचान बनी है जिसकी
कभी मांगा हक उससे
अपने यहां रहने की
बड़ा अफसोस है
इन बदमस्त हवाओं को
सरहदो से नही रिश्ता है फिर भी
अमन और सितम दोनो में कितना फ़र्क है
महसुस करती है ये हवाएं एक साथ ही
कभी इन हवाओं में गुलामी की जंजीर थी
बहारों के खुश्बुओं में आजादी की दुआ रहती थी
अब तो है स्वराज देश में
मैं बहार हूं
झुमना चाहता हूं
मगर लाहौर से कश्मीर आते-आते रुक जाता हूं
मुझे भी झुमने दो
बहार बनके घूमने दो
रोक दो दहशती कारनामो को
बहार लौट ना पाये इस दफ़ा
बिन देखे ज़लवा तेरा
बहारें लौट के आई है
देखने ज़लवा तेरा
लेकिन उन्हे क्या पता
कि भारत-पाक अब एक नही

Friday, August 13, 2010

मीडिया इतनी डरी सहमी क्यूं है ?

मीडिया पे हमेशा वाद-विदाद चलता रहता है । खासकर मैन स्टीम मीडिया को लेकर बहस का सिलसिला तो कभी थमता ही नही । मीडियाकर्मी अपने आप को लोकतंत्र का प्रहरी मानते हैं । उन्हे लगता है कि सवाल पुछना ही ‌उनकी फितरत है । चाहे संसद का गलियारा हो या फिर सड़क का चौक-चौराहा । मीडिया लगातार हशिये पर जा रही है । इसके पिछे एक खास वज़ह भी है । एक तो मीडिया अपने मापांक के पैमाने पे खड़ा उतरने के लिए बेकरार रहता है । जिसे मीडिया के ही शब्दो में टीआरपी कहते है । यानि टेलिविजन रैंटिंग प्वाइन। तो वहीं दूसरी तरफ बाजार और लोगो की मांग का बहाना बना कर अपने पर उठ रहे सवाल को खारिज करता है । लेकिन इस बात की वास्तविकता ये नही है । सबसे पहले तो मीडिया में अब वो जजवा नही रहा । जिस जजवा के लिए मीडिया का निर्माण किया गया । हरेक मीडिया संगठन किसी ना किसी पॉलिशी के तहत कार्य करता है । और आप को बता दू कि जब तक कोई भी कर्मचारी इन पॉलिशियों से रु-ब-रु नही हो पाता है, तब तक वह उस संगठन के लिए बेकार जैसा रहता है । खैर इन पॉलिशियों को समझने में ज्यादा समय नही लगता है । लेकिन जिस बात को लेकर आज का मंथन है वो ये कि आखिर क्यो मीडिया इतनी डरी सहमी है........ । क्यो आज मीडिया अपना दर्शक वर्ग नही बना पा रही है....... । क्यो मीडिया को क्लाइमेक्स की जरुरत है ......क्यो मीडिया के चैनल हर खबर से अपने आप को स्थापित करना चाहता है ......क्यो मीडिया को ऐसा लगता है कि ब्रेक के बाद दर्शक उनके चैनल के साथ नही बने रहेगें .....क्यो कहा जाता आप बने रहे है ब्रेक के बाद भी......इन सब के पीछे जो एक तर्क कार्य करता कि मीडिया डरी सहमी हुई है । शायद यही वजह है कि प्राइम टाइम में बड़े-बड़े चैनल फिल्मो का प्रोमोशन करता है ।और एक दर्शक वर्ग बनाना चाहता है । लेकिन इतने से ही काम नही चल पाता है तो फिर धारावाहिको क्लाइमेक्स और कॉमेडी, गीत संगीत के कार्यक्रम को समाचार का रुप देकर परोसा जाता है । मीडिया के इन चैनलो के लिए भूत भी खास तरह के न्यूज बनाता है खासकर तब जब प्रतिद्वंदी चैनल के हाथ कोइ पुखता समाचार हो । ऐसे हालात में सवाल ये उठता है कि मीडिया अपने गिरते स्तर के लिए किसको जिम्मेदार माने । उस मीडियाकर्मी को जो नये आते है और थके हारे से महसुस करते हैं । या फिर उन मीडियाकर्मीयों को जो मीडिया में कई दशक से कार्य कर रहें हैं । और कॉर्पोरेटरों के हित को देखते नीति का निर्माण करते हैं । सच्चाई ये है कि मीडिया खुद में एक ऐसा बाजार बन गया है जहां हर कुछ बेचा जाता है । खासकर समाचारों को बेचना यहां मुख्य रुप से होता है । समाचारो को बेचने के लिए एक खास अंदाज एक खास आवाज और एक खास विषय चुना जाता है । इसके कई उदाहरण भी है । जैसे किसी मुद्दा को बहस बना देना या फिर किसी बहस को मुद्दा के तौर पर पेश करना । आये दिन जिस तरह से बॉलिबु़ड वाले मीडिया चैनल को फिल्मो के प्रोमो के लिए इस्तमाल कर रहें हैं लगता है कि नही है कि ये हिन्दुस्तान का न्यूज चैनल है । न्यूज चैनल का ये MTV रुप लोगो को चैनल और इन्टरटेनमेंट चैनल के फर्क को खत्म लगभग खत्म कर दिहा है । शायद यही वजह है कि मंहगाई, अशिक्षा बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, गांव-देहात , और प्रशासनिक अन्याय कभी मुख्य खबर नही बन पाती है ।

Friday, July 30, 2010

कभी किसी रोज

कभी किसी रोज
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा
छुपा लेना अपने सारे जज्बातों को
क्योकि.....
बयां-ए-जज्बात ना जाने क्या कह देगें
और फिर मैं चाहता भी तो नही
कि....
यादों की तस्वीर फिर से उभरे
सांसों में फिर से वो तुफान हो
मिलने की व्याकुलता
और होंठो पे मेरा नाम हो
क्योकि.....
ये सब तो बस
एक वहम सा है

कभी किसी रोज
ये वहम टुटेगा
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा

Saturday, July 17, 2010

बेवफाई बेहतर है बेइमानी से

नये शहर में रौशन आया तो लगा नया सवेरा होगा....लेकिन ये तो वही सुबह है । हल्की-हल्की किरणों के साथ जागता सुरज....और मध्यम होते शाम में रात की आगोश में सोता सुरज....रात भी वही है, चॉद भी वही है, सितारों की चमक और ख्वाबों का जहां भी वही है । फिर क्यूं इतना बनावटीपन है इस शहर में ?
मैं बात कर रहा हुं दिल्ली की । दिल्ली में बहुत लोगों से जान पहचान हुई । कुछ तो कॉलेज में और कुछ कॉलेज से बाहर । कोई खास बनना चाहा और शायद इसमें वो सफल भी हुआ... लेकिन खास का मतलब यहां सिर्फ उसके लिए जुगाड़ होता है । जुगाड़ से मतलब है रिश्तों में मुनाफे का हिसाब । ये मुनाफा कई तरह के होते हैं । अगर आप इस तरह के मुनाफे से वाकिफ़ हैं तो शायद मेरे कहने का मतलब समझ पा रहे होंगें । खैर रिश्तों में हिसाब-किताब करना ही बेइमानी है ।
शायद यही वज़ह है कि बेवफाई बेहतर है बेइमानी से....और हम तो ये भी मानते हैं कि “ अच्छा हुआ सनम कि...मैं बेवफा हो गया, वफादार तो कुत्ते हुआ करते हैं ’’
कितने वफादार कुत्ते को तो मैंने भी देखा है । लेकिन क्या भौंकने भर से वफादारी होती है ? नही ना.........
क्षणिक भर का सुख बहुत दुखदायी होता है । ये जानते हुए भी क्षण भंगुर संसार में रम जाना कितना आश्चर्यजनक है । नये शहर में पुरानी बातें अजीब लगती है । पर हमें ये मान के चलना चाहिए कि शहर कोई सा भी हो मनुष्य का स्वभाव एक सा ही होता है । जिंदगी के राह चलते-चलते एक रौशन ख्वाब से टकरा गया था मैं । मौजो के इस सफर में उफान सा छा जाता है, जब उस हंसी पल में गोते लगाता हुं । सफर के इस हकीकत को अनचाहे ही कोई समझा गया था मुझे । शायद यकीं था उसे खुद पे इतना मेरा सफर था लम्बा जितना ।
“उजाले अपनी यादों का साथ ही रहने देना
जाने किस गली में जिंदगी की शाम ढ़ल जाए”



ये अल्फ़ाज नही मुकमल्ल एक कहानी है । वो रौशन ख़्वाब यही अल्फ़ाज बनके मेरे ज़ेहन में आज भी अभिनव है । लेकिन जिंदगी के इस अनजाने डगर में, मैं यूहीं चला जा रहा हूं । ना रास्तों का इल्म है, ना मंजील की ख़बर । गुमनामी के इस जहां में हस्तें-मुस्कुरातें, ठोकर खाते, गिरते-सम्भलतें खुद की परछाईं का पिछा किये जा रहा हुं । डर है कहीं जिंदगी के इस दौड़ में रफ्तार से समझोता ना करना पड़ जाये । फिर भी यकीं है कि इस अभिनव जगत में ये रौशन भी कभी मील का पत्थर साबित होगा ।


“अकेला चला था....अकेला चलूंगा
जिंदगी के सहारे.....ना दो साथ मेरा
कभी तो मैं....खुद को साबित करुंगा
सहज़ मिल सके....वो नही लक्ष्य मेरा
बहुत दूर है मेरे....निशां का सवेरा
अगर थक गये हो....तो तुम लौट जाओ
गगन के सितारे....देगें साथ मेरा ”

Tuesday, June 29, 2010

हम चले कॉलेज जब

इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब


चॉद रौशन हुआ
हम चले कॉलेज जब
कुछ मिला,कुछ मिल गया
हम चले कॉलेज जब

बेफ्रिक, बेशबरी का आलम
और एहसासों का दौर
कितने ख्वाबों का सफर था
हम चले कॉलेज जब

सामने आये जो तुम
हम सभंल पाये नही
खो गया शायद था कुछ
हम चले कॉलेज जब

दास्तां तो थी अधूरी
जाने कितने कारवां के
बस सफर बढ़ने लगी थी
हम चले कॉलेज जब

दिप का अगर नाम लेलू
बदनामी रौशन की होगी
लौ बन के जल लिये
हम चले कॉलेज जब

लाइब्रेरी भी सुना हुआ था
खाली-खाली लग रहा था
नजरो में कोइ बस चुका था
हम चले कॉलेज जब

साथ दोस्तो का रहता
तन्हा-तन्हा फिर क्यूं लगता
ऐसी हालत पहली दफा था
हम चले कॉलेज जब

घर से आया सोच के
पढ़ना है जी-जान से
जान से ही जी लगा था
हम चले कॉलेज जब

कुछ चुनीन्दे है फ़साने
ख्वाब और मेरे दरमिंया के
यूं ही नही लिख दिया हुं
हम चले कॉलेज जब
 
इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब

Saturday, January 23, 2010

बाजारू समाज और वेश्यावृति

समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग बाज़ार होता है और बाज़ार कि स्थिति व्यापार कि सार्थकता पर निर्भर करता है ।हमारा समाज अति प्राचीन अवधारणाओं पे चली रही है । इस समाज ने व्यापार वर्ग को जन्म दिया जिसकाकालांतर में सीमा ख़त्म हो गया है । अब जरुरी नही कि सोने का व्यापारी सौनर ही हो या लोहे का व्यापारी लोहारया कोई अन्य व्यापर जिसका सम्बन्ध किसी वर्ग विशेष से रहा हो , वहीं उसका व्यापर करता हो । ऐसे मेंवेस्यवृति का व्यापर हमारे देश में किसी वर्ग विशेष से जुड़ा नहीं रहा है । परन्तु इसका व्यापक इतिहास रहा है ।आज जिस तरह से वेश्यावृति के व्यापर के लिए एक सुझाव निकल के सामने आ रहा है कि इस धंधे को भीसरकारी मान्तया मिलनी चाहिए । तो वाकई उन शोषित और पीड़ित महिलाओं के कल्याण के लिए उठाया गयापहला कदम माना जा सकता है। जिसे समाज शोषित तो करना चाहती है परन्तु स्वीकारना नहीं ।
हमारे कल के समाज और आज के समाज में बहुत अंतर है । हमने विकास के कई तालो को पार कर लिया है औरआधुनिकता की बुनियाद भी रख दी है । पर क्या वेश्याओ की स्थिति सुदृढ़ हो पाई है ? बहुत ही संवेदनशील सवालहै की जब वेश्याओं का इस समाज में दखल एक अभिन्न अंग के रूप में रहा है तो फिर उनके स्वीकार्यता औरमान्यता पे प्रश्न क्यूँ ?
कुछ बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि वेश्यावृति समाज को दूषित करती है और इसकी मान्यता कतई ना दी जाय ।तो ऐसे में इस राय कि एक पहलु जो सामने आती है वह यह कि वेश्याएं समाज को दूषित करती है परन्तु वेश्याओंको कौन सा समज बढ़ावा दे रहा है ? एक गरीब समाज जिस समाज में बाल -विवाह होता है और संभोग के प्रतिकोई लालसा नहीं रहती है या फिर एक पूंजीवादी समाज जहाँ पैसो का कोई मूल्य नहीं होता और ४० वर्ष उम्र सीमातक कुवारा रहने कि प्रथा बढ़ रही है ।
हमेसा से यह कवायत चली आ रही है कि धोती कुरता सफ़ेद दिखे । परन्तु उस सफेदी को जो साबुन बरकराररखती है उसका महत्व कोई नहीं जानता है । ठीक उसी साबुन की तरह वेश्याओं का धंधा है , जो समाज को स्वच्छबनाये रखने में अपने महत्व को खो बैठी है ।
वेश्याओं के लिए भी वो सारी सुविधाएं होनी चाहिए जो किसी सामजिक व्यक्ति के लिए होता है । आखिर वेश्याओंका सम्बन्ध किसी तीसरी दुनिया के लोगो के साथ नहीं होता है । हम वेश्याओं के साथ बिस्तर एक करने के लिएराजी है ,परन्तु इसी बिस्तर को स्थाईत्व देने के लिए नही । वेश्याएं अपने तन- बदन- योवन से इस समाज को तृप्तकरती रहे और बदले में समाज उसे रंडी , रखैल , छिनाल , वेश्या ,धंधेवाली आदि उपाधियों से ही संतुष्ट रहने कीअपेक्षा करें ।
आख़िरकार फैसला सरकार के हाथों में है कि वे इस सुझाव को अमिलिजामा का रूप देते हैं या फुहरवादी राजनीतिका ।