Friday, August 13, 2010
मीडिया इतनी डरी सहमी क्यूं है ?
मीडिया पे हमेशा वाद-विदाद चलता रहता है । खासकर मैन स्टीम मीडिया को लेकर बहस का सिलसिला तो कभी थमता ही नही । मीडियाकर्मी अपने आप को लोकतंत्र का प्रहरी मानते हैं । उन्हे लगता है कि सवाल पुछना ही उनकी फितरत है । चाहे संसद का गलियारा हो या फिर सड़क का चौक-चौराहा । मीडिया लगातार हशिये पर जा रही है । इसके पिछे एक खास वज़ह भी है । एक तो मीडिया अपने मापांक के पैमाने पे खड़ा उतरने के लिए बेकरार रहता है । जिसे मीडिया के ही शब्दो में टीआरपी कहते है । यानि टेलिविजन रैंटिंग प्वाइन। तो वहीं दूसरी तरफ बाजार और लोगो की मांग का बहाना बना कर अपने पर उठ रहे सवाल को खारिज करता है । लेकिन इस बात की वास्तविकता ये नही है । सबसे पहले तो मीडिया में अब वो जजवा नही रहा । जिस जजवा के लिए मीडिया का निर्माण किया गया । हरेक मीडिया संगठन किसी ना किसी पॉलिशी के तहत कार्य करता है । और आप को बता दू कि जब तक कोई भी कर्मचारी इन पॉलिशियों से रु-ब-रु नही हो पाता है, तब तक वह उस संगठन के लिए बेकार जैसा रहता है । खैर इन पॉलिशियों को समझने में ज्यादा समय नही लगता है । लेकिन जिस बात को लेकर आज का मंथन है वो ये कि आखिर क्यो मीडिया इतनी डरी सहमी है........ । क्यो आज मीडिया अपना दर्शक वर्ग नही बना पा रही है....... । क्यो मीडिया को क्लाइमेक्स की जरुरत है ......क्यो मीडिया के चैनल हर खबर से अपने आप को स्थापित करना चाहता है ......क्यो मीडिया को ऐसा लगता है कि ब्रेक के बाद दर्शक उनके चैनल के साथ नही बने रहेगें .....क्यो कहा जाता आप बने रहे है ब्रेक के बाद भी......इन सब के पीछे जो एक तर्क कार्य करता कि मीडिया डरी सहमी हुई है । शायद यही वजह है कि प्राइम टाइम में बड़े-बड़े चैनल फिल्मो का प्रोमोशन करता है ।और एक दर्शक वर्ग बनाना चाहता है । लेकिन इतने से ही काम नही चल पाता है तो फिर धारावाहिको क्लाइमेक्स और कॉमेडी, गीत संगीत के कार्यक्रम को समाचार का रुप देकर परोसा जाता है । मीडिया के इन चैनलो के लिए भूत भी खास तरह के न्यूज बनाता है खासकर तब जब प्रतिद्वंदी चैनल के हाथ कोइ पुखता समाचार हो । ऐसे हालात में सवाल ये उठता है कि मीडिया अपने गिरते स्तर के लिए किसको जिम्मेदार माने । उस मीडियाकर्मी को जो नये आते है और थके हारे से महसुस करते हैं । या फिर उन मीडियाकर्मीयों को जो मीडिया में कई दशक से कार्य कर रहें हैं । और कॉर्पोरेटरों के हित को देखते नीति का निर्माण करते हैं । सच्चाई ये है कि मीडिया खुद में एक ऐसा बाजार बन गया है जहां हर कुछ बेचा जाता है । खासकर समाचारों को बेचना यहां मुख्य रुप से होता है । समाचारो को बेचने के लिए एक खास अंदाज एक खास आवाज और एक खास विषय चुना जाता है । इसके कई उदाहरण भी है । जैसे किसी मुद्दा को बहस बना देना या फिर किसी बहस को मुद्दा के तौर पर पेश करना । आये दिन जिस तरह से बॉलिबु़ड वाले मीडिया चैनल को फिल्मो के प्रोमो के लिए इस्तमाल कर रहें हैं लगता है कि नही है कि ये हिन्दुस्तान का न्यूज चैनल है । न्यूज चैनल का ये MTV रुप लोगो को चैनल और इन्टरटेनमेंट चैनल के फर्क को खत्म लगभग खत्म कर दिहा है । शायद यही वजह है कि मंहगाई, अशिक्षा बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, गांव-देहात , और प्रशासनिक अन्याय कभी मुख्य खबर नही बन पाती है ।
Friday, July 30, 2010
कभी किसी रोज
कभी किसी रोज
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा
छुपा लेना अपने सारे जज्बातों को
क्योकि.....
बयां-ए-जज्बात ना जाने क्या कह देगें
और फिर मैं चाहता भी तो नही
कि....
यादों की तस्वीर फिर से उभरे
सांसों में फिर से वो तुफान हो
मिलने की व्याकुलता
और होंठो पे मेरा नाम हो
क्योकि.....
ये सब तो बस
एक वहम सा है
कभी किसी रोज
ये वहम टुटेगा
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा
छुपा लेना अपने सारे जज्बातों को
क्योकि.....
बयां-ए-जज्बात ना जाने क्या कह देगें
और फिर मैं चाहता भी तो नही
कि....
यादों की तस्वीर फिर से उभरे
सांसों में फिर से वो तुफान हो
मिलने की व्याकुलता
और होंठो पे मेरा नाम हो
क्योकि.....
ये सब तो बस
एक वहम सा है
कभी किसी रोज
ये वहम टुटेगा
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा
Saturday, July 17, 2010
बेवफाई बेहतर है बेइमानी से
नये शहर में रौशन आया तो लगा नया सवेरा होगा....लेकिन ये तो वही सुबह है । हल्की-हल्की किरणों के साथ जागता सुरज....और मध्यम होते शाम में रात की आगोश में सोता सुरज....रात भी वही है, चॉद भी वही है, सितारों की चमक और ख्वाबों का जहां भी वही है । फिर क्यूं इतना बनावटीपन है इस शहर में ?
मैं बात कर रहा हुं दिल्ली की । दिल्ली में बहुत लोगों से जान पहचान हुई । कुछ तो कॉलेज में और कुछ कॉलेज से बाहर । कोई खास बनना चाहा और शायद इसमें वो सफल भी हुआ... लेकिन खास का मतलब यहां सिर्फ उसके लिए जुगाड़ होता है । जुगाड़ से मतलब है रिश्तों में मुनाफे का हिसाब । ये मुनाफा कई तरह के होते हैं । अगर आप इस तरह के मुनाफे से वाकिफ़ हैं तो शायद मेरे कहने का मतलब समझ पा रहे होंगें । खैर रिश्तों में हिसाब-किताब करना ही बेइमानी है ।
शायद यही वज़ह है कि बेवफाई बेहतर है बेइमानी से....और हम तो ये भी मानते हैं कि “ अच्छा हुआ सनम कि...मैं बेवफा हो गया, वफादार तो कुत्ते हुआ करते हैं ’’
कितने वफादार कुत्ते को तो मैंने भी देखा है । लेकिन क्या भौंकने भर से वफादारी होती है ? नही ना.........
क्षणिक भर का सुख बहुत दुखदायी होता है । ये जानते हुए भी क्षण भंगुर संसार में रम जाना कितना आश्चर्यजनक है । नये शहर में पुरानी बातें अजीब लगती है । पर हमें ये मान के चलना चाहिए कि शहर कोई सा भी हो मनुष्य का स्वभाव एक सा ही होता है । जिंदगी के राह चलते-चलते एक रौशन ख्वाब से टकरा गया था मैं । मौजो के इस सफर में उफान सा छा जाता है, जब उस हंसी पल में गोते लगाता हुं । सफर के इस हकीकत को अनचाहे ही कोई समझा गया था मुझे । शायद यकीं था उसे खुद पे इतना मेरा सफर था लम्बा जितना ।
“उजाले अपनी यादों का साथ ही रहने देना
जाने किस गली में जिंदगी की शाम ढ़ल जाए”
ये अल्फ़ाज नही मुकमल्ल एक कहानी है । वो रौशन ख़्वाब यही अल्फ़ाज बनके मेरे ज़ेहन में आज भी अभिनव है । लेकिन जिंदगी के इस अनजाने डगर में, मैं यूहीं चला जा रहा हूं । ना रास्तों का इल्म है, ना मंजील की ख़बर । गुमनामी के इस जहां में हस्तें-मुस्कुरातें, ठोकर खाते, गिरते-सम्भलतें खुद की परछाईं का पिछा किये जा रहा हुं । डर है कहीं जिंदगी के इस दौड़ में रफ्तार से समझोता ना करना पड़ जाये । फिर भी यकीं है कि इस अभिनव जगत में ये रौशन भी कभी मील का पत्थर साबित होगा ।
“अकेला चला था....अकेला चलूंगा
जिंदगी के सहारे.....ना दो साथ मेरा
कभी तो मैं....खुद को साबित करुंगा
सहज़ मिल सके....वो नही लक्ष्य मेरा
बहुत दूर है मेरे....निशां का सवेरा
अगर थक गये हो....तो तुम लौट जाओ
गगन के सितारे....देगें साथ मेरा ”
मैं बात कर रहा हुं दिल्ली की । दिल्ली में बहुत लोगों से जान पहचान हुई । कुछ तो कॉलेज में और कुछ कॉलेज से बाहर । कोई खास बनना चाहा और शायद इसमें वो सफल भी हुआ... लेकिन खास का मतलब यहां सिर्फ उसके लिए जुगाड़ होता है । जुगाड़ से मतलब है रिश्तों में मुनाफे का हिसाब । ये मुनाफा कई तरह के होते हैं । अगर आप इस तरह के मुनाफे से वाकिफ़ हैं तो शायद मेरे कहने का मतलब समझ पा रहे होंगें । खैर रिश्तों में हिसाब-किताब करना ही बेइमानी है ।
शायद यही वज़ह है कि बेवफाई बेहतर है बेइमानी से....और हम तो ये भी मानते हैं कि “ अच्छा हुआ सनम कि...मैं बेवफा हो गया, वफादार तो कुत्ते हुआ करते हैं ’’
कितने वफादार कुत्ते को तो मैंने भी देखा है । लेकिन क्या भौंकने भर से वफादारी होती है ? नही ना.........
क्षणिक भर का सुख बहुत दुखदायी होता है । ये जानते हुए भी क्षण भंगुर संसार में रम जाना कितना आश्चर्यजनक है । नये शहर में पुरानी बातें अजीब लगती है । पर हमें ये मान के चलना चाहिए कि शहर कोई सा भी हो मनुष्य का स्वभाव एक सा ही होता है । जिंदगी के राह चलते-चलते एक रौशन ख्वाब से टकरा गया था मैं । मौजो के इस सफर में उफान सा छा जाता है, जब उस हंसी पल में गोते लगाता हुं । सफर के इस हकीकत को अनचाहे ही कोई समझा गया था मुझे । शायद यकीं था उसे खुद पे इतना मेरा सफर था लम्बा जितना ।
“उजाले अपनी यादों का साथ ही रहने देना
जाने किस गली में जिंदगी की शाम ढ़ल जाए”
ये अल्फ़ाज नही मुकमल्ल एक कहानी है । वो रौशन ख़्वाब यही अल्फ़ाज बनके मेरे ज़ेहन में आज भी अभिनव है । लेकिन जिंदगी के इस अनजाने डगर में, मैं यूहीं चला जा रहा हूं । ना रास्तों का इल्म है, ना मंजील की ख़बर । गुमनामी के इस जहां में हस्तें-मुस्कुरातें, ठोकर खाते, गिरते-सम्भलतें खुद की परछाईं का पिछा किये जा रहा हुं । डर है कहीं जिंदगी के इस दौड़ में रफ्तार से समझोता ना करना पड़ जाये । फिर भी यकीं है कि इस अभिनव जगत में ये रौशन भी कभी मील का पत्थर साबित होगा ।
“अकेला चला था....अकेला चलूंगा
जिंदगी के सहारे.....ना दो साथ मेरा
कभी तो मैं....खुद को साबित करुंगा
सहज़ मिल सके....वो नही लक्ष्य मेरा
बहुत दूर है मेरे....निशां का सवेरा
अगर थक गये हो....तो तुम लौट जाओ
गगन के सितारे....देगें साथ मेरा ”
Thursday, July 1, 2010
मौजो के तेरे शहर में....इक मकां अपना भी होगा....

धड़कने जब साथ न देंगी,पर याद तेरी आती रहेगी,थम जायेगा दुनिया का कारवां'फिर भी ये सपना रहेगा...मौजो के तेरे शहर में,इक मकां अपना भी होगा !!
हम है इस "अभिनव" जगत में,"रौशन" यहाँ है जिंदगानी'ख़ुशी ने कर लिया है रुख़ तेरा
मेरी क्यों लुट गयी जवानी ???
पर तुझे तो मेरे साथ चलना ही होगा
पर तुझे तो मेरे साथ चलना ही होगा
क्योकि मेरे सिवा कोई तेरा अपना ना होगा
और तब मौजों के तेरे शहर में
इक मकां अपना भी होगा...

उम्मीद की इक रोशनी दिखी है
प्यार तेरे भी दिल में छिपी है
आसमां है गर मंजील मेरा
तो साथ तुझे भी उड़ना ही होगा
तब मौजों के तेरे शहर में
इक मकां अपना भी होगा...
Tuesday, June 29, 2010
हम चले कॉलेज जब
इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब
चॉद रौशन हुआ
हम चले कॉलेज जब
कुछ मिला,कुछ मिल गया
हम चले कॉलेज जब
बेफ्रिक, बेशबरी का आलम
और एहसासों का दौर
कितने ख्वाबों का सफर था
हम चले कॉलेज जब
सामने आये जो तुम
हम सभंल पाये नही
खो गया शायद था कुछ
हम चले कॉलेज जब
दास्तां तो थी अधूरी
जाने कितने कारवां के
बस सफर बढ़ने लगी थी
हम चले कॉलेज जब
दिप का अगर नाम लेलू
बदनामी रौशन की होगी
लौ बन के जल लिये
हम चले कॉलेज जब
लाइब्रेरी भी सुना हुआ था
खाली-खाली लग रहा था
नजरो में कोइ बस चुका था
हम चले कॉलेज जब
साथ दोस्तो का रहता
तन्हा-तन्हा फिर क्यूं लगता
ऐसी हालत पहली दफा था
हम चले कॉलेज जब
घर से आया सोच के
पढ़ना है जी-जान से
जान से ही जी लगा था
हम चले कॉलेज जब
कुछ चुनीन्दे है फ़साने
ख्वाब और मेरे दरमिंया के
यूं ही नही लिख दिया हुं
हम चले कॉलेज जब
इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब
चॉद रौशन हुआ
हम चले कॉलेज जब
कुछ मिला,कुछ मिल गया
हम चले कॉलेज जब
बेफ्रिक, बेशबरी का आलम
और एहसासों का दौर
कितने ख्वाबों का सफर था
हम चले कॉलेज जब
सामने आये जो तुम
हम सभंल पाये नही
खो गया शायद था कुछ
हम चले कॉलेज जब
दास्तां तो थी अधूरी
जाने कितने कारवां के
बस सफर बढ़ने लगी थी
हम चले कॉलेज जब
दिप का अगर नाम लेलू
बदनामी रौशन की होगी
लौ बन के जल लिये
हम चले कॉलेज जब
लाइब्रेरी भी सुना हुआ था
खाली-खाली लग रहा था
नजरो में कोइ बस चुका था
हम चले कॉलेज जब
साथ दोस्तो का रहता
तन्हा-तन्हा फिर क्यूं लगता
ऐसी हालत पहली दफा था
हम चले कॉलेज जब
घर से आया सोच के
पढ़ना है जी-जान से
जान से ही जी लगा था
हम चले कॉलेज जब
कुछ चुनीन्दे है फ़साने
ख्वाब और मेरे दरमिंया के
यूं ही नही लिख दिया हुं
हम चले कॉलेज जब
इक तमन्ना ले के निकले
हम चले कॉलेज जब
क्या पता था दिल लुटेगा
हम चले कॉलेज जाब
Friday, June 11, 2010
काश मैं गुलाम होता....
दुनिया आज जिस रफ़्तार से उचाइयो को चूमने को बेताब हो रही है ऐसा लगता है मानों की एक समय वो उसकी आगोश में ही पहुँच जाएगी...
रफ़्तार के इस दौड़ में सब एक दुसरे को पीछे छोड़ना चाहते है...रफ़्तार के इस दौड़ में किसी को किसी की फ़िक्र नही है...
ऐसे आलम में हमारा भारत भी पीछे नही छूटा है...वो भी इस रफ़्तार से रफ्तार मिलाये हुए है....हम भारतीय तो वैसे भी जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान के नारे से प्रेरित लोग है...हमारे और सफलता के बीच तो वैसे भी गहरा सम्बन्ध है....या यूँ कहे तो हम एक दुसरे के पूरक बन गये है.... आजादी के बाद जैसे जैसे दिन बीतते गये वैसे वैसे हमारे पंख फैलते जा रहे है....आज हमारी उड़ान का लोहा तो दुनिया मानती है...
लेकिन सवाल ये उठता है की इतने विकाश के बाद भी हम वो सोने की चिड़िया क्यों नही बन पाए जो हम कई दसक पहले हुआ करतें थे...आज हम जो है उसका सपना न तो सावरकर ने देखा था न ही गाँधी ने...!
फिरंगियो से आजादी तो हमने 63 साल पहले ही पा लिया था....लेकिन सच मायने में हम आज भी गुलाम बने हुए है.....आज हम जहाँ आतंकवाद और पूंजीवाद के रूप में बाहरी शक्तिओ के सामने घुटने टेक चुके है वही नक्सलवाद और अलगाववाद हम पर आंतरिक रूप से हावी हो गया है..... आजादी के लिए दी गयी जानें हमें याद है मगर वर्तमान में जारी उपरोक्त वादों ने हमसे कितनी कुर्बानिया ली है शायद किसी ने गौर नही फरमाया....
आज हम हर तरफ से बर्बादी के मंजर से घिर चुके है....लेकिन रफ़्तार से कोई समझौता करने को तैयार नही है...जिन्दगी की कीमत तो हमारे देश में इतनी सस्ती हो गयी है की हर तरफ बस खरीदार ही नजर आते है हम कब किसके हाथो बिक जायेंगे कुछ पता नही...
शायद अच्छी तो गुलामी की वो बेरिया थी जिनसे लिपट कर माँ भारती आंशु तो बहा पा रही थी...लेकिन आज तो उसकी आबरू पे ही बन आई है...और अपनी माँ के आबरू से बढ़ कर किसी लाल के लिए कुछ नही हो सकता...
इसमें कोई दो राये नही की हमारा भारत महान है लेकिन आज ये खुद से परेशां है...मुझे इस बात को कहने में तनिक भी अतिश्योक्ति नही हो रही है की आज मुझे फिर से गुलामी की जंजीर मंजूर है लेकिन माँ भारती क सिने में चोट और गद्दारी मैं नही सह पाऊंगा...
जय हिंद
जय माँ भारती
रफ़्तार के इस दौड़ में सब एक दुसरे को पीछे छोड़ना चाहते है...रफ़्तार के इस दौड़ में किसी को किसी की फ़िक्र नही है...
ऐसे आलम में हमारा भारत भी पीछे नही छूटा है...वो भी इस रफ़्तार से रफ्तार मिलाये हुए है....हम भारतीय तो वैसे भी जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान के नारे से प्रेरित लोग है...हमारे और सफलता के बीच तो वैसे भी गहरा सम्बन्ध है....या यूँ कहे तो हम एक दुसरे के पूरक बन गये है.... आजादी के बाद जैसे जैसे दिन बीतते गये वैसे वैसे हमारे पंख फैलते जा रहे है....आज हमारी उड़ान का लोहा तो दुनिया मानती है...
लेकिन सवाल ये उठता है की इतने विकाश के बाद भी हम वो सोने की चिड़िया क्यों नही बन पाए जो हम कई दसक पहले हुआ करतें थे...आज हम जो है उसका सपना न तो सावरकर ने देखा था न ही गाँधी ने...!
फिरंगियो से आजादी तो हमने 63 साल पहले ही पा लिया था....लेकिन सच मायने में हम आज भी गुलाम बने हुए है.....आज हम जहाँ आतंकवाद और पूंजीवाद के रूप में बाहरी शक्तिओ के सामने घुटने टेक चुके है वही नक्सलवाद और अलगाववाद हम पर आंतरिक रूप से हावी हो गया है..... आजादी के लिए दी गयी जानें हमें याद है मगर वर्तमान में जारी उपरोक्त वादों ने हमसे कितनी कुर्बानिया ली है शायद किसी ने गौर नही फरमाया....
आज हम हर तरफ से बर्बादी के मंजर से घिर चुके है....लेकिन रफ़्तार से कोई समझौता करने को तैयार नही है...जिन्दगी की कीमत तो हमारे देश में इतनी सस्ती हो गयी है की हर तरफ बस खरीदार ही नजर आते है हम कब किसके हाथो बिक जायेंगे कुछ पता नही...
शायद अच्छी तो गुलामी की वो बेरिया थी जिनसे लिपट कर माँ भारती आंशु तो बहा पा रही थी...लेकिन आज तो उसकी आबरू पे ही बन आई है...और अपनी माँ के आबरू से बढ़ कर किसी लाल के लिए कुछ नही हो सकता...
इसमें कोई दो राये नही की हमारा भारत महान है लेकिन आज ये खुद से परेशां है...मुझे इस बात को कहने में तनिक भी अतिश्योक्ति नही हो रही है की आज मुझे फिर से गुलामी की जंजीर मंजूर है लेकिन माँ भारती क सिने में चोट और गद्दारी मैं नही सह पाऊंगा...
जय हिंद
जय माँ भारती
Tuesday, February 16, 2010
फिल्मो की राजनीति !!!
जैसे जैसे समाज उचाइयो की तरफ बढ़ रहा है वैसे वैसे गन्दी राजनीति की घोर अँधेरी चादर हम ओढ़े चले जा रहे है.... आज इसका प्रकोप ना सिर्फ संसद में अपितु फिल्मो में भी दिनों दिन बढ़ रहा है।
एक समय था जब फिल्मो को मात्र मनोरंजन का साधन माना जाता था , लेकिन अगर हाल ही में आई दो फिल्म 'थ्री इदीअत' और 'माय नेम इज खान' की बात करे तो उसपे की गई ओछी राजनीति का साफ़ पर्दा उठता है ।
जहाँ आमिर खान की ३ इदिअत में चेतन भगत द्वारा किया गया हस्तछेप उनकी आने वाली किताबो के लिए वरदान साबित हुआ वही शाहरुख़ खान की हालिया फिल्म भी उनके बयान के कारण आनन् फानन में बहु चर्चित हो गयी ।
कही न कही इसमें स्वार्थ की बू आती है। मामला स्पष्ट हैं की चेतन भगत ने जो कयास बाद में लगाये है वो कयास वो फिल्म के रिलीस होने के पहले भी लगा सकते थे । आम जनता को इसका नतीजा तक सही से मालूम नही हो पाया। हाँ ! इतना जरूर पता चला की चेतन भगत की कहानियो में दम होता है।
वही बात करे अगर खान की तो उनका बयान भी बचकाना लगता है॥ अगर उन्हें पाक खिलाडी सच में पसंद थे तो ले लिया होता अपने नाईट राइडर में लेकिन उन्होंने ऐसा नही किया । मैं मानता हूँ की पाक खिलाड़ ओहेलना के लायक नही है। लेकिन खान पे जो दवाव पहले था वो अचानक कहा चला गया। अपनी गलती को उन्होंने नही बताया की वो किसके दवाव में थे हालाँकि ये कथित दवाव तो सब पे था लेकिन किसी ने इसे तुल देना वाजिब नही समझा फिर अंत में खान ही क्यों?
शिवसेना का विरोध भी मुझे महज एक ओछापअन लगता है क्योकि अगर उन्हें देश की इतनी ही फिकर है तो कुछ नही तो शांत तो बैठ सकते है। आज उनके जैसे सम्प्रदैक लोगो से देश खुद जूझ रहा है।
कुल मिला के आज समाज में हमारे चारो ओर ऐसी परिस्थितिया है की हम खुल के साँस भी नही ले सकते है। मेरा उन सब लोगो से विनम्र निवेदन है की देश के विकाश में सहयोग दे न की आंतरिक कलह se माँ भारती के सीने पे कलाह के बिज बोये ।
एक समय था जब फिल्मो को मात्र मनोरंजन का साधन माना जाता था , लेकिन अगर हाल ही में आई दो फिल्म 'थ्री इदीअत' और 'माय नेम इज खान' की बात करे तो उसपे की गई ओछी राजनीति का साफ़ पर्दा उठता है ।
जहाँ आमिर खान की ३ इदिअत में चेतन भगत द्वारा किया गया हस्तछेप उनकी आने वाली किताबो के लिए वरदान साबित हुआ वही शाहरुख़ खान की हालिया फिल्म भी उनके बयान के कारण आनन् फानन में बहु चर्चित हो गयी ।
कही न कही इसमें स्वार्थ की बू आती है। मामला स्पष्ट हैं की चेतन भगत ने जो कयास बाद में लगाये है वो कयास वो फिल्म के रिलीस होने के पहले भी लगा सकते थे । आम जनता को इसका नतीजा तक सही से मालूम नही हो पाया। हाँ ! इतना जरूर पता चला की चेतन भगत की कहानियो में दम होता है।
वही बात करे अगर खान की तो उनका बयान भी बचकाना लगता है॥ अगर उन्हें पाक खिलाडी सच में पसंद थे तो ले लिया होता अपने नाईट राइडर में लेकिन उन्होंने ऐसा नही किया । मैं मानता हूँ की पाक खिलाड़ ओहेलना के लायक नही है। लेकिन खान पे जो दवाव पहले था वो अचानक कहा चला गया। अपनी गलती को उन्होंने नही बताया की वो किसके दवाव में थे हालाँकि ये कथित दवाव तो सब पे था लेकिन किसी ने इसे तुल देना वाजिब नही समझा फिर अंत में खान ही क्यों?
शिवसेना का विरोध भी मुझे महज एक ओछापअन लगता है क्योकि अगर उन्हें देश की इतनी ही फिकर है तो कुछ नही तो शांत तो बैठ सकते है। आज उनके जैसे सम्प्रदैक लोगो से देश खुद जूझ रहा है।
कुल मिला के आज समाज में हमारे चारो ओर ऐसी परिस्थितिया है की हम खुल के साँस भी नही ले सकते है। मेरा उन सब लोगो से विनम्र निवेदन है की देश के विकाश में सहयोग दे न की आंतरिक कलह se माँ भारती के सीने पे कलाह के बिज बोये ।
Saturday, January 23, 2010
बाजारू समाज और वेश्यावृति
समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग बाज़ार होता है और बाज़ार कि स्थिति व्यापार कि सार्थकता पर निर्भर करता है ।हमारा समाज अति प्राचीन अवधारणाओं पे चली रही है । इस समाज ने व्यापार वर्ग को जन्म दिया जिसकाकालांतर में सीमा ख़त्म हो गया है । अब जरुरी नही कि सोने का व्यापारी सौनर ही हो या लोहे का व्यापारी लोहारया कोई अन्य व्यापर जिसका सम्बन्ध किसी वर्ग विशेष से रहा हो , वहीं उसका व्यापर करता हो । ऐसे मेंवेस्यवृति का व्यापर हमारे देश में किसी वर्ग विशेष से जुड़ा नहीं रहा है । परन्तु इसका व्यापक इतिहास रहा है ।आज जिस तरह से वेश्यावृति के व्यापर के लिए एक सुझाव निकल के सामने आ रहा है कि इस धंधे को भीसरकारी मान्तया मिलनी चाहिए । तो वाकई उन शोषित और पीड़ित महिलाओं के कल्याण के लिए उठाया गयापहला कदम माना जा सकता है। जिसे समाज शोषित तो करना चाहती है परन्तु स्वीकारना नहीं ।
हमारे कल के समाज और आज के समाज में बहुत अंतर है । हमने विकास के कई तालो को पार कर लिया है औरआधुनिकता की बुनियाद भी रख दी है । पर क्या वेश्याओ की स्थिति सुदृढ़ हो पाई है ? बहुत ही संवेदनशील सवालहै की जब वेश्याओं का इस समाज में दखल एक अभिन्न अंग के रूप में रहा है तो फिर उनके स्वीकार्यता औरमान्यता पे प्रश्न क्यूँ ?
कुछ बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि वेश्यावृति समाज को दूषित करती है और इसकी मान्यता कतई ना दी जाय ।तो ऐसे में इस राय कि एक पहलु जो सामने आती है वह यह कि वेश्याएं समाज को दूषित करती है परन्तु वेश्याओंको कौन सा समज बढ़ावा दे रहा है ? एक गरीब समाज जिस समाज में बाल -विवाह होता है और संभोग के प्रतिकोई लालसा नहीं रहती है या फिर एक पूंजीवादी समाज जहाँ पैसो का कोई मूल्य नहीं होता और ४० वर्ष उम्र सीमातक कुवारा रहने कि प्रथा बढ़ रही है ।
हमेसा से यह कवायत चली आ रही है कि धोती कुरता सफ़ेद दिखे । परन्तु उस सफेदी को जो साबुन बरकराररखती है उसका महत्व कोई नहीं जानता है । ठीक उसी साबुन की तरह वेश्याओं का धंधा है , जो समाज को स्वच्छबनाये रखने में अपने महत्व को खो बैठी है ।
वेश्याओं के लिए भी वो सारी सुविधाएं होनी चाहिए जो किसी सामजिक व्यक्ति के लिए होता है । आखिर वेश्याओंका सम्बन्ध किसी तीसरी दुनिया के लोगो के साथ नहीं होता है । हम वेश्याओं के साथ बिस्तर एक करने के लिएराजी है ,परन्तु इसी बिस्तर को स्थाईत्व देने के लिए नही । वेश्याएं अपने तन- बदन- योवन से इस समाज को तृप्तकरती रहे और बदले में समाज उसे रंडी , रखैल , छिनाल , वेश्या ,धंधेवाली आदि उपाधियों से ही संतुष्ट रहने कीअपेक्षा करें ।
आख़िरकार फैसला सरकार के हाथों में है कि वे इस सुझाव को अमिलिजामा का रूप देते हैं या फुहरवादी राजनीतिका ।
हमारे कल के समाज और आज के समाज में बहुत अंतर है । हमने विकास के कई तालो को पार कर लिया है औरआधुनिकता की बुनियाद भी रख दी है । पर क्या वेश्याओ की स्थिति सुदृढ़ हो पाई है ? बहुत ही संवेदनशील सवालहै की जब वेश्याओं का इस समाज में दखल एक अभिन्न अंग के रूप में रहा है तो फिर उनके स्वीकार्यता औरमान्यता पे प्रश्न क्यूँ ?
कुछ बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि वेश्यावृति समाज को दूषित करती है और इसकी मान्यता कतई ना दी जाय ।तो ऐसे में इस राय कि एक पहलु जो सामने आती है वह यह कि वेश्याएं समाज को दूषित करती है परन्तु वेश्याओंको कौन सा समज बढ़ावा दे रहा है ? एक गरीब समाज जिस समाज में बाल -विवाह होता है और संभोग के प्रतिकोई लालसा नहीं रहती है या फिर एक पूंजीवादी समाज जहाँ पैसो का कोई मूल्य नहीं होता और ४० वर्ष उम्र सीमातक कुवारा रहने कि प्रथा बढ़ रही है ।
हमेसा से यह कवायत चली आ रही है कि धोती कुरता सफ़ेद दिखे । परन्तु उस सफेदी को जो साबुन बरकराररखती है उसका महत्व कोई नहीं जानता है । ठीक उसी साबुन की तरह वेश्याओं का धंधा है , जो समाज को स्वच्छबनाये रखने में अपने महत्व को खो बैठी है ।
वेश्याओं के लिए भी वो सारी सुविधाएं होनी चाहिए जो किसी सामजिक व्यक्ति के लिए होता है । आखिर वेश्याओंका सम्बन्ध किसी तीसरी दुनिया के लोगो के साथ नहीं होता है । हम वेश्याओं के साथ बिस्तर एक करने के लिएराजी है ,परन्तु इसी बिस्तर को स्थाईत्व देने के लिए नही । वेश्याएं अपने तन- बदन- योवन से इस समाज को तृप्तकरती रहे और बदले में समाज उसे रंडी , रखैल , छिनाल , वेश्या ,धंधेवाली आदि उपाधियों से ही संतुष्ट रहने कीअपेक्षा करें ।
आख़िरकार फैसला सरकार के हाथों में है कि वे इस सुझाव को अमिलिजामा का रूप देते हैं या फुहरवादी राजनीतिका ।
Tuesday, January 12, 2010
शिक्षा
एक भारतीय नगरिक होने का अधिकार इस देश के बच्चे को जन्म के साथ मिलता है / और १८ वर्ष की उर्म में उसे वयस्क धोषित कर संविधान में लिखे गये सभी अधिकारों का उत्तराधिकारी भी बना दिया जाता है / इस नविन उर्म मे जब उसे वयस्क धोषित किया जाता है तो उसे इस देश के लोकतान्त्रिक व्यवस्था को समझने के लिए शिक्षा की आवश्यकता महशुस होती है / परन्तु शिक्षा उससे कोशों दूर होता है / (साक्षरता , शिक्षा का पैमाना नहीं होता है ) महानगरो के नवयुवक अपवाद स्वरूप हैं / अब ऐसें में प्रश्न यह उठता है की शिक्षा के स्तर को उठाने के लिए किसी प्रयोग की आवस्यकता है क्या ? तो जबाब बिलकुल हाँ होगा / आज पूरी दुनिया वैश्विकरण की दौर से गुजर रही है और हमारे देश मे अभी तक शिक्षा को साक्षर बनाने का कुंजी माना जा रहा है / जबकि शिक्षा सिर्फ साक्षर बनाने की किंजी मात्र नहीं है वरन यह मनुष्य के जीवन स्तर सुधारने की संस्था है /
विकाशील राष्ट्र की उपाधि मिलने के बाद से भारतीय किशोरों के लिए शिक्षा सबसे अहम हैं /
जिस तरह पश्चिम के देश ने निरंतर अपने शिक्षा शैली को बदला है वह उनके जीवन स्तर को देखने से साफ स्पस्ट हो जाता है / बात बिलकुल साफ है , इस देश को भी तकनिकी शिक्षा की आवश्यकता है / तकनिकी शिक्षा की शुरुआत हमें माध्यमिक विद्यालयों से करना होगा और इस तकनिकी शिक्षा का आधार कंप्यूटर को बनाना होगा / इस तरह से इंटर विद्यालय तक आते -आते हमरे पास कम से कम ऐसें प्रोग्रम्मेर ,डेवलोपोर, डिजाईनर,आधि हो जायेंगे जो इस गओबल मार्केट मे भी अपने को स्थिर कर पाने में सक्षम होंगे /और इस तरह इन किशोरों के मदद से हम विकसित राष्ट्र के सपने को भी सच कर पाएंगे /
बरहहल जिस तरह से शिक्षा पर राजनीति हो रही है और सिर्फ बहस तक ही सिमटी हुई है /सरकार को इस नव दशक में शिक्षा के सभी खामियों को दूर करने के लिए एवं शिक्षा में प्रयोग के लिए मिशन के तहत कार्य करना होगा /
विकाशील राष्ट्र की उपाधि मिलने के बाद से भारतीय किशोरों के लिए शिक्षा सबसे अहम हैं /
विकाशील राष्ट्र की उपाधि मिलने के बाद से भारतीय किशोरों के लिए शिक्षा सबसे अहम हैं /
जिस तरह पश्चिम के देश ने निरंतर अपने शिक्षा शैली को बदला है वह उनके जीवन स्तर को देखने से साफ स्पस्ट हो जाता है / बात बिलकुल साफ है , इस देश को भी तकनिकी शिक्षा की आवश्यकता है / तकनिकी शिक्षा की शुरुआत हमें माध्यमिक विद्यालयों से करना होगा और इस तकनिकी शिक्षा का आधार कंप्यूटर को बनाना होगा / इस तरह से इंटर विद्यालय तक आते -आते हमरे पास कम से कम ऐसें प्रोग्रम्मेर ,डेवलोपोर, डिजाईनर,आधि हो जायेंगे जो इस गओबल मार्केट मे भी अपने को स्थिर कर पाने में सक्षम होंगे /और इस तरह इन किशोरों के मदद से हम विकसित राष्ट्र के सपने को भी सच कर पाएंगे /
बरहहल जिस तरह से शिक्षा पर राजनीति हो रही है और सिर्फ बहस तक ही सिमटी हुई है /सरकार को इस नव दशक में शिक्षा के सभी खामियों को दूर करने के लिए एवं शिक्षा में प्रयोग के लिए मिशन के तहत कार्य करना होगा /
विकाशील राष्ट्र की उपाधि मिलने के बाद से भारतीय किशोरों के लिए शिक्षा सबसे अहम हैं /
Wednesday, January 6, 2010
ख्याल
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल में
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये माना मैंने कि नया साल आएगा
क्या फर्क, लेकिन वो भी पुराना पर जायेगा
फिर आने वाले नाये साल का इंतजार होगा
और ये सफ़र तो यू ही बरक़रार होगा
मै सोचता हु ......
इन्ही बीते हुए सालो से तो सभी की जिन्दगी बनती है
ये मेरे बीते हुए साल , ये मेरे बीते हुए लम्हें तेरा मुझपे अहसान तो रहेगा
हर एक पल तुम मुझसे दूर होते हुए जाओगे
मगर तुम्हारी दी हुए याद ऐसे में मेरे पास तो रहेगा
कि अब तेरे हर वक्त का पहचान तो रहेगा
है कहानी बन गयी मेरे इस हल की
फिर लिखूंगा दास्ताँ मैं नाये साल की
कोई समझे या ना समझे
मैं समझने का कोशिश करूँगा समय की हर चल की
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल में
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये माना मैंने कि नया साल आएगा
क्या फर्क, लेकिन वो भी पुराना पर जायेगा
फिर आने वाले नाये साल का इंतजार होगा
और ये सफ़र तो यू ही बरक़रार होगा
मै सोचता हु ......
इन्ही बीते हुए सालो से तो सभी की जिन्दगी बनती है
ये मेरे बीते हुए साल , ये मेरे बीते हुए लम्हें तेरा मुझपे अहसान तो रहेगा
हर एक पल तुम मुझसे दूर होते हुए जाओगे
मगर तुम्हारी दी हुए याद ऐसे में मेरे पास तो रहेगा
कि अब तेरे हर वक्त का पहचान तो रहेगा
है कहानी बन गयी मेरे इस हल की
फिर लिखूंगा दास्ताँ मैं नाये साल की
कोई समझे या ना समझे
मैं समझने का कोशिश करूँगा समय की हर चल की
काफी कुछ खत्म हो गया
इस बीते हुए साल मे
न चाहते हुए भी,
मै हु आज इस हल में
ये आँसु ये तनहाई
अमानत है मेरी
क्यूकि मै खुद बिखर गया ,
एक अनजाने से ख्याल में
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