“दिल, दिमाग और दवात के संगम की उपज”
Wednesday, October 24, 2012
“दिल, दिमाग और दवात"
“दिल, दिमाग और दवात के संगम की उपज”
हवाओं का आसियां
Saturday, January 7, 2012
तुम इतने निर्दयी कैसे
मेरे अँसुवन नैनों के नीर
दोनों मेरे हो के भी
सावन मोती बहतें हैं
निश्छल ह्रदय
व्याकुल मन मेरा
प्रीत की आस लगाये था
तुम मधुमास
बसंत तुम फागुन
सरसों फूल सुनहरी सी
ज्येष्ठ दोपहरी आग सा झुलसा
नियत तुम्हारी जो पढ़ ली
कुंठित प्रेम
कलंक की भाषा
अभिनव छवि दिखाई थी
तुम योवन भूख की माया
मेरा प्रेम विहंगम सा
रूप रतन सब तेरे तेज
मुझपे असर ना कर पाया
विचलित हूँ
की बिसराऊँ कैसे
पर विवस नहीं हूँ उस माया से
यह मोह भंग में कष्ट है
लेकिन
तुम इतने निर्दयी कैसे
Wednesday, January 4, 2012
मुस्लिम औरतों की दयनीय स्थिति : ज़रूरत है एक आपा की
पहली महिला न्यायाधीश बी फातिमा , राजनेता मोहसिना किदवई , नजमा हेपतुल्लाह , समाज-सेविका -अभिनेत्री शबाना आज़मी, सौन्दर्य की महारती शहनाज़ हुसैन, नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर, पूर्व महिला हाकी कप्तान रजिया जैदी, टेनिस सितारा सानिया मिर्जा, गायन में मकाम-बेगम अख्तर, परवीन , साहित्य-अदब में नासिर शर्मा, मेहरून निसा परवेज़, इस्मत चुगताई, कुर्रतुल ऍन हैदर तो पत्रकारिता में सादिया देहलवी और सीमा मुस्तफा जैसे कुछ और नाम लिए जा सकते हैं, जो इस बात के साक्ष्य हो ही सकते हैं की यदि इन औरतों को भी उचित अवसर मिले तो वो भी देश-समाज की तरक्की में उचित भागीदारी निभा सकती हैं।
लेकिन सच तो यह है कि फातिमा बी या सानिया या मोहसिना जैसी महिलाओं का प्रतिशत बमुश्किल इक भी नहीं है। अनगिनत शाहबानो, अमीना और कनीज़ अँधेरी सुरंग में रास्ता तलाश कर रही हैं।
भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 40 प्रतिशत है, इसमें मुस्लिम महिला मात्र 11 प्रतिशत है। हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने वाली इन महिलाओं का प्रतिशत मात्र 2 है और स्नातक तक का प्रतिशत 0.81
मुस्लिम संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मुस्लिम लड़कों का अनुपात 56.5 फीसदी है, छात्राओं का अनुपात महज़ 40 प्रतिशत है। इसी तरह मिडिल स्कूलों में छात्रों का अनुपात 52.3 है तो छात्राओं का 30 प्रतिशत है।
अनपढ़ रहकर जीना कितना मुहाल है, ये अनपढ़ ही जानते हैं। पढ़े-लिखों के बीच उठने-बैठने में, उनसे सामंजस्य स्थापित करने में बहुत कठिनाई दरपेश रहती है। मुस्लिम औरतों का इस वजह्कर चौतरफा विकास नहीं हो पाता। वो हर क्षेत्र में पिछड़ जाती हैं। प्राय:कम उम्र में उनकी शादी कर दी जाती है। शादी के बाद शरू होता है,घर-ग्रहस्ती का जंजाल। फिर तो पढ़ाई का सवाल ही नहीं। ग़लत नहीं कहा गया है कि पहली शिक्षक मां होती है। लेकिन इन मुस्लिम औरतों कि बदकिस्मती है कि वोह चाह कर भी अपने बच्चों को क ख ग या अलिफ़ बे से पहकई मुस्लिम देश ऐसे हैं जहां महिलाएं हर क्षेत्र में सक्रिय हैं। लेकिन विश्व की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले धर्म-निरपेक्ष तथा गणतंत्र भारत में उसकी स्थिति पिंजडे में बंद परिंदे की क्यों?
इसका जिम्मेदार मुल्ला-मौलवी और पुरूष प्रधान समाज ही नहीं स्वयं महिलाएं भी हैं जो साहस और एकजुटता का परिचय नहीं देतीं।
ज़रूरत है इक बी आपा की जिन्होंने अलीगढ में स्कूल कालेज की स्थापना की थी।चान नहीं करा पातीं।
Wednesday, December 21, 2011
सोशल मीडिया की निगरानी
उसकी यह संभावना और लोगों तक सीधी पहुंच केवल सत्ताधारी ही नहीं बल्कि उन लोगों को चिंतित किये हुए है जो जनमत को अपनी ताल पर थिरकते देखना चाहते हैं। लोकतंत्र होते हुए भी भारत में अंग्रेजों के बनाये कानूनों की आड़ में सूचनाओं को छापने और छिपाने का खेल आजादी के बाद भी दशकों तक चला है।
जूलियस असांजे ने सूचनाओं को फाइलों की गिरफ्त से निकाल कर लोगों तक पहुंचाने का काम किया तो तमाम सरकारें उसके खिलाफ खड़ी हो गयीं। लेकिन असांजे के इस दुस्साहस ने गली-मुहल्ले में ऐसे किशोरों की फौज खड़ी कर दी जो अपने हाथ लगी ननिहीं सी जानकारी को भी इंटरनेट के माध्यम से दुनियां भर में बांटने को मचल उठे।
इस बेचैनी को निकलने का मार्ग मिला जब वेब मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ। सबसे पहले पत्रकारों की नयी पीढ़ी ने इसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और बाद में बड़ी संख्या में नागरिक भी इससे जुड़ते गये। पहले ब्लॉग और उसके बाद ऑरकुट, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की असीम संभावनाओं के द्वार खोल दिये। बेहद कम समय में बहुत अधिक लोकप्रियता पाने का कारण था इसका सस्ता और सर्वसुलभ होना। साथ ही यह ऐसा माध्यम बन गया जिसमें बतकही के लिये पूरी गुंजाइश थी, भाषा और भावों का, छन्द और व्याकरण का कोई बन्धन न था।
मीडिया में छपने वाले आंकड़ों में देश की सुनहरी तस्वीर और मजबूत होती अर्थव्यवस्था की खबरे छपती थीं तो मंहगाई से जूझ रहा नागरिक यह संदेह तो करता था कि कहीं-न-कहीं दाल में काला है किन्तु कसमसाने के अलावा कुछ भी कर सकना उसके लिये असंभव था। लेकिन सोशल मीडिया में अपनी बात कहने के साथ ही अपने विचार से सहमत लोगों को ढ़ूंढ़ निकालना भी अत्यंत सरल हो गया।
जल्दी ही राष्ट्रीय मुद्दों पर समान रूप से सोचने वाले लोगों की गोलबंदी होने लगी और सोशल मीडिया एक आंदोलन का आधार बन गया। सोशल मीडिया के माध्यम का उपयोग कर मध्य एशिया के देशों में परिवर्तन की जो लहर चली उसने दुनियां भर सरकारों को चौकन्ना कर दिया। भारत सरकार भी उस पर प्रभावी नियंत्रण की योजना बनाती इससे पहले ही अन्ना की टीम ने इसका पहला सफल प्रयोग किया। जंतर-मंतर पर अन्ना के पहले प्रदर्शन के बाद हुए रामदेव के आंदोलन को सरकार ने जिस तरह कुचलने की कोशिश की उससे रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन को धार मिली। रामदेव के समर्थकों पर हुई हिंसा के विरोध में सोशल मीडिया पर टिप्पणियों की बाढ़ आ गयी। यही बाढ़ बाद में अन्ना के समर्थन में तब्दील हो गयी।
अब जबकि अन्ना की टीम ने सरकार को दोबारा घेरने की कोशिश शुरू कर दी है, सरकार चाहती है कि सोशल मीडिया की मुश्कें कुछ इस तरह कस दी जायें ताकि आने वाले समय में वह अन्ना के लिये प्लेटफॉर्म न बन सके।
इसी कवायद का एक हिस्सा था संचार मंत्री सिब्बल द्वारा सोशल मीडिया साइट के संचालकों को बुला कर दी गयी कपिल सिब्बल की घुड़की। चिन्ता की बात यह है कि इन साइट संचालकों ने भारत में इसकी चर्चा भी नहीं की। न ही मंत्रालय के भीतर की हलचल सूंघने वाले खोजी खबरियों ने इसे छापा। वाशिंगटन पोस्ट में छपने के बाद भारत की मीडिया में इस पर बावेला मचा।
सोशल साइटों पर लगाम लगाने की सिब्बल की कोशिश को व्यक्तिगत प्रयास नहीं बल्कि सरकार की नीति ही मानना चाहिये। यद्यपि सिब्बल द्वारा उठाये गये प्रश्नों को भी महत्व दिया जाना चाहिये। उनके द्वारा उठाये गये नैतिकता और मूल्यों के सवाल नकार दिये जाने योग्य नहीं हैं और उन पर गंभीर चिंतन आवश्यक है। किन्तु यह कवायद तब अर्थ खो देती है जब लगता है कि यह सरकार की ईमानदार कोशिश के बजाय नागरिकों की जबान बंद करने की कोशिश अधिक है।
यदि सरकार को लगता है कि वह इसमें सफल हो सकेगी तो इसकी संभावना बेहद कम है। इसलिये नहीं कि पूरा देश अन्ना के समर्थन में आ खड़ा हुआ है अथवा मध्य एशिया के देशों की तरह क्रांति पर उतर आया है, बल्कि इसलिये, क्योंकि मीडिया और सरकार की लगातार बेरुखी के बाद आम नागरिकों के हाथ एक ऐसा माध्यम आया है जहाँ उनकी समस्याओं का हल नहीं है लेकिन कम से कम बिना किसी प्रतिबंध के अपनी बात कह सकने की आजादी तो है।
Tuesday, December 6, 2011
मल्टीब्रांड एफ़डीआई यानी चोर छिप गया भागा नहीं है!
फूल था मैं कांटा बनाकर रख दिया,
और अब कहते हैं कि चुभना छोड़दे।
Friday, December 2, 2011
गुजरे पल की कसक

कि पल जो गुजरतें हैं
वो मेरे थे कभी
अब भी आता हुआ
पल मेरा ही है
फिर ...
क्यूँ तलाशता हूँ
गुजरे पल को अक्सर
उस फिजा को
उस महक को
उस रवानगी को
जो हमने बनाई थी
ये बात, उफ़ ये बात
मगर फिर भी ...
Monday, November 28, 2011
उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व घमासान
अमरजीत चौधरीउत्तर प्रदेश राज्य में होने वाले विधानसभा के आम चुनाव वैसे तो हमेशा ही पूरे देश के लिए उत्सुकता का विषय बने रहते हैं। परंतु इस बार खासतौर पर इन चुनावों पर पूरे देश की नज़र टिकी हुई है। इसके कई कारण हैं। एक तो यह कि प्रदेश की राजनीति में यह पहला मौका था जबकि पिछले चुनावों में बहुजन समाज पार्टी अपने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई तथा इन दिनों अकेले दम पर अपना कार्यकाल पूरा कर रही है। लिहाज़ा देश की नज़र इस बात पर है कि ‘‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’’ की बात करने वाली बसपा तथा उसकी नेता एवं प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अपने उपरोक्त नारों पर अमल कर पाने में कहां तक खरी उतर पाई हैं।
और यह भी कि बहुजन हिताय की बात करते-करते सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय की बातें करने का उन्हें लाभ हुआ है या नुकसान यह भी आने वाला चुनाव ही तय करेगा। दूसरी ओर विपक्षी दलों में मची इस बात की प्रतिस्पर्धा पर भी सभी की नज़रें टिकी हैं कि आखिर कौन सा दल स्वयं को मुख्य विपक्षी दल के रूप में राज्य में स्थापित कर पाता है। फिलहाल चुनाव पूर्व गठबंधन के नाम पर सिवाय कांग्रेस व राष्ट्रीय लोकदल में हुए समझौते के अन्य किसी राजनैतिक दल के साथ किसी भी पार्टी के चुनाव पूर्व गठबंधन किए जाने का कोई समाचार नहीं है। परंतु चुनाव का समय नज़दीक आते-आते इस प्रकार के होने वाले किसी गठबंधन से इंकार भी नहीं किया जा सकता।
बहरहाल, चुनाव पूर्व जैसा कि होता चला आ रहा है सत्तारुढ़ दल अर्थात् बहुजन समाज पार्टी अपने तरकश के सभी तीर चलाने में मसरूफ है। पिछले दिनों बड़े ही आश्चर्यजनक तरीके से राज्य विधानसभा का एक दिन का सत्र बुलाकर चंद मिनटों में ही लेखानुदान पारित करा दिया गया तथा प्रदेश को चार भागों में विभाजित करने जैसा अति महत्वपूर्ण एवं अतिसंवेदनशील प्रस्ताव भी आनन-फानन में पारित कर राज्य के बंटवारे संबंधी गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी गई। इसके अतिरिक्त बहुजन समाज से पटरी बदलकर सर्वजन समाज की ओर रुख करती हुई बसपा ब्राह्मण मतों को आकर्षित करने के लिए एक बार फिर तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है।
इन सबके अतिरिक्त टिकट बंटवारे को लेकर भी पार्टी में भीषण घमासान की खबरें हैं। हालांकि अभी चुनाव आयोग द्वारा राज्य विधानसभा चुनाव के संबंध में न तो कोई तिथि घोषित की गई है न ही इस संबंध में कोई अधिसूचना जारी हुई है। परंतु अभी से लगभग सभी राजनैतिक दलों द्वारा अपनी-अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा किए जाने का काम शुरु कर दिया गया है। खबरों के अनुसार बसपा में लगभग तीन दर्जन विधायकों को पार्टी इस बार चुनाव मैदान में पुनरू उतारने नहीं जा रही है। ऐसे में ज़ाहिर है इनमें से अधिकांश विधायकों ने अभी से बागी तेवर दिखाने शुरु कर दिए हैं और ऐसे विधायक अब दूसरी पार्टियों की ओर देख रहे हैं।
ज़ाहिर है टिकट वितरण के इस वातावरण में एक बार फिर सौदेबाज़ी की भी पूरी खबरें आ रही हैं। समाचारों के अनुसार बसपा के जिन विधायकों को इस बार पार्टी के टिकट से वंचित रखा जा रहा है उससे दहशत खाए हुए अन्य पार्टी विधायक सभी शर्तों को पूरा कर टिकट लेने की जुगत में लग गए हैं। उधर कांग्रेस पार्टी हालांकि अपने युवराज राहुल गांधी को तुरुप के पत्ते के रूप में मुख्य चुनाव प्रचारक की हैसियत से मैदान में उतारकार पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की आस लगाए हुए है। परंतु हकीकत में कांग्रेस को राज्य में भारी गुटबाज़ी का भी सामना करना पड़ रहा है।
बड़े आश्चर्य की बात है कि अन्ना हज़ारे तथा बाबा रामदेव जैसे स्वयंभू भ्रष्टाचार विरोधी श्पुरोधा्य उत्तर प्रदेश से ही अपने भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का सार्वजनिक शंखनाद करने जा रहे हैं तो दूसरी ओर इन सबसे बेपरवाह राजनैतिक दल व इनके कुछ नेता टिकट वितरण जैसे सुनहरे अवसर को धन उगाही के सर्वोत्तम माध्यम के रूप में अपनाए जाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। इन घटनाओं को उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व मचे घमासान का मात्र श्रीगणेश ही समझा जाना चाहिए।
Saturday, November 26, 2011
ये मुस्कुराहट तो वो नही
शायद मेरे महबूब से भी ज्यादा
ये ख़ामोशी कितना कुछ कहता है
शायद मेरा महबूब भी जो ना कह सका
इस आवारगी में भी कितना सुकून है
शायद सादगी जो ना कर सका
ये मुस्कुराहट तो वो नही
जिसके खिलते ही लव गुलाब बनते थे
ये आह्ट तो वो नही
जिसके सुनते ही दिल में चिराग चलते थे
ये तस्वीर बनावटी है
या फिर ...
बनावटीपन ही तम्हारी छवि है
Sunday, October 9, 2011
अमरजीत चौधरी
यह बहस आजकल काफी तेज़ होती जा रही है कि क्या न्यायपालिका जानबूझकर सरकार के नीतिगत मामलों में अवांछित दख़ल दे रही है या फिर कार्यपालिका की निष्क्रियता और बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण अदालतों को संविधान की रक्षा और जनहित में सक्रिय होना पड़ रहा है। आमतौर पर यह माना जाता है कि कोर्ट कई बार समाज और सरकार के बीच पैदा होने वाले तनाव को कम करने के लिये सेफ्टी वाल्व’ का काम भी करता है।
अगर गौर से देखा जाये तो पिछले कुछ समय में एक के बाद एक ऐसे निर्णय अदालतों से आये हैं जिनसे सरकार को न केवल नीचा देखना पड़ा है बल्कि जनता ने राहत की सांस भी ली है। मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश में इलाहबाद हाईकोर्ट ने जहां एक के बाद एक माया सरकार के कृषि भूमि अधिग्रहित करने के कई फैसलों को अवैध ठहराकर पलट दिया जिससे यूपी सरकार की काफी किरकिरी हुई वहीं सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के जयपुर में दो दशक से चल रहे 552 बीघा ज़मीन के एक मामले में यह एतिहासिक फै़सला दिया कि सरकार सार्वजनिक उद्देश्य के लिये अधिग्रहित भूमि को अन्य लाभार्थियों को फिर से आवंटित नहीं कर सकती।
इससे पहले उच्चतम न्यायालय सरकार को देश में एक तरफ भूख से लगातार मौतें होने और दूसरी तरफ बड़ी मात्रा में खुले में रखे अनाज के सड़ने से बर्बाद होने पर फटकार लगाते हुए यह आदेश दे चुका है कि इस गेहूं को खराब होने से बचाने में अगर सरकार अक्षम है तो क्यों न इसको गरीबों में निशुल्क वितरित कर दिया जाये। ऐसा ही एक निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार के अवैध सलवा जूडुम अभियान के खिलाफ देते हुए कहा है कि बिना किसी प्रशिक्षण और नियम कानून के जनता के कुछ लोगों को विशेष पुलिस अधिकारी बनाकर हथियार देना और माओवादियों से निबटने के नाम पर मनमानी की छूट देना असंवैधनिक है जिसे तत्काल रोका जाना चाहिये। मज़ेदार बात यह है कि इस अवैध और विवादास्पद अभियान में केंद्र सरकार भी मानदेय में 80 प्रतिशत का योगदान कर रही थी। गुरूल्लिओं की तरह काम कर रहे इन 5000 विशेष पुलिस अधिकारियों पर नक्सलवाद के सफाये के नाम पर करीब 600 गांवों को लूटने और जलाने सहित मानवाधिकार उल्लंघन के ढेर सारे आरोप लगाये जाते रहे हैं लेकिन सरकार ने सशस्त्रा सेना विशेषाध्किर अध्नियम की तरह इस मामले में भी आंखे बंद कर रखी थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामजेठमलानी की एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने जब काले धन पर पूर्व न्यायधीश की देखरेख में विशेष जांच दल का गठन किया तो सरकार बौखला गयी। माननीय न्यायमूर्ति एस एस निज्जर और न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी की बैंच ने इस मामले में सख़्त रूख़ अपनाते हुए यहां तक कहा कि उदारवादी आर्थिक नीतियां देश को लूट और लालच की तरफ ले जा रही हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट योगगुरू बाबा रामदेव के द्वारा दिल्ली के रामलीला मैदान में शांतिपूर्वक किये जा रहे अनशन को सरकार द्वारा पुलिस के ज़रिये बर्बर ढंग से कुचलने के खिलापफ भी तीखी टिप्पणी करते हुए जवाब तलब कर चुका है। थोड़ा और पीछे मुड़कर देखें तो सरकार ने भी एक तरह से पूरी बेशर्मी पर कमर बांध रखी है वह लगातार यह दावे करती रहती है कि वह भ्रष्टाचार को ख़त्म करने को लेकर पूरी तरह गंभीर है लेकिन जब कानून के काम करने की बारी आती है तो वह आरोपियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। पूर्व केंदीय संचार मंत्री ए राजा का मामला हो या विवादास्पद सीवीसी पी जे थामस, यूपीए सरकार के प्रमुख घटक द्रमुक प्रमुख की लाडली बेटी कनिमोझी की गिरफ़्तारी की बात हो या कॉमन वैल्थ गैम्स घोटाले के प्रमुख आरोपी सुरेश कलमाड़ी को जेल भेजने की मजबूरी मनमोहन सरकार ने एड़ी से चोटी तक का ज़ोर इनको बचाने के लिये लगाया लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को हड़काते हुए बार बार उसकी काहिली पर उंगली उठाई तब कहीं जाकर सरकार और कॉंग्रेस ने इन आरोपियों से पीछा छुड़ाया। जिससे सरकार की कथनी करनी में अंतर के कारण ही कोर्ट को सकि्रय होना पड़ रहा है। ऐसे अनेक मामले देखने में आते हैं जब लोग गंभीर अपराधों की भी एफआईआर थानों में दर्ज नहीं किये जाने पर मजबूर होकर अदालतों में जाते हैं।


