Friday, May 24, 2013

आकाश का सूनापन...



अक्सर गर्मी में जंगलों को जलते तो सुना है , लेकिन कभी जंगलों को उनकी अपनी ही छाँव में जलते  देखा है? जब जंगल खुद अपनी ही छाँव में जल उठे तो कैसा अजीब लगता होगा न ...  ये तो वही बात हुई कि सागर एक दिन खुद में ही डूब जाए और शिकायत भी करे कि वो प्यासा  है| जिस सागर में  दुनियाँ जहान की मीठी  नदियाँ आकर मिलती हैं| वो भला कैसे प्यासा हो गया? इसी तरह,  जो जंगल मनुहार कर के सावन को बुलाते हैं, और धरती की प्यास बुझाते हैं| जो अपने  हरे भरे वृक्षों की छाँव में पंथियों और पंछियों  को आश्रय  देते हैं | वो जंगल उसी छाँव  में  कैसे जलने लगते  है?

दरअसल सभी के अपने-अपने दुःख और अपने-अपने सुख  हैं| जंगल में भटकते हुए हिरन जिस खुशबू  से  परेशान है | वो उसी की कस्तूरी है उसे कौन बताये ? चाँद , जो हमेशा से सुन्दरता और प्रेम का प्रतीक बना  बैठा है| उसके पास  दर्द के गहरे स्याह  गड्डे है जिसे कोई प्रेमी देख  नहीं पाता|  सूरज की अपनी पीड़ा है सारे ब्रम्हांड का स्वामी है, जो समूची धरती को जीवन देता है| उसकी उष्मा और तपिश  इतनी की कोई  समीप  जाना  ही नहीं  चाहता | सूरज अकेले ही जलता रहता है कोई उसके संग नहीं क्यों? सावन  के अपने दुःख की धरती की प्यास बुझाते-बुझाते वो कितना प्यासा हो गया| कोई नहीं जानता क्यों? धरती के अपने प्रश्न कि सदियों से सहते-सहते थक गयी | उसके पुत्र  माँ-माँ  कह कर उसे उलीचते रहे और किसी ने भी उसके सीने पर पड़ी  दरारों को गिना क्यों नहीं?

आकाश का अपना अलग सूनापन है- कोई तारे उधार ले गया| कोई चाँद माँग कर ले गया| कोई आया  तो मेघ चुरा ले गया तो कोई काली  घटा को छीन के ले गया | आकाश फिर खाली हो गया क्यों ?

हमारे जीवन में भी तो यही होता हैं ना | दुनिया के लिए जीने वाले, दुनिया के दर्द को गले लगाने वाले | दुनिया के लिए बहने वाले, महकने वाले, खिलने वाले, खुशबू बिखेरने वाले, रोने वालों को अपना कंधा देने वाले, दूसरों  के आँसू पोछने  वाले, दूसरों के जीवन के उलझे हुए धागों को सुलझाने वाले क्यों एक दिन   उदास हो जाते हैं दुखी हो जाते हैं?

ये जंगल खुद अपनी छाँव  में क्यों जलने लगते हैं ? रूह तो उनकी भी होती है ना जो दूसरे को रूहानी सुकून देते है | प्यास तो उनकी भी होती है ना जो दूसरों को सावन देते हैं | सागर भी तो, चाहता है की कोई मीठी गागर उसके खारेपन को ख़तम कर दे | कोई घटा आकाश के सूनेपन को भर दे| तो चलिए ना किसी सागर की गागर बन जाए | किसी आकाश की  घटा किसी धरती के सूखे  टुकड़े पर चलो कोई सावन  रख दें |

चलिए ये पंक्तियाँ  सुनिए:

"बादलों का नाम ना हो ,अम्बरों के गाँव में
जलता हो जंगल खुद अपनी छाँव में
यही तो है मौसम, आओ तुम और हम
बारिश के नगमे गुनगुनाएं
थोड़ा सा  रूमानी हो जाएँ
दर्द को बांसुरी  बनाए "

तो, आईये हम अपने दर्द को अबकी बार बाँसुरी बना लें| किसी जंगल को अपनी हीं छाँव में जलने से बचा लें... (साभार - ममता व्यास)

Wednesday, October 24, 2012

“दिल, दिमाग और दवात"

तुम्हारे गज़ल से मुखरे पर बिछी रौशन मुस्कान का मैं कायल हूं । समुंद्र सी गहरी, झील सी प्यारी, रात सी काली, बोलती आंखों की जुबान का मैं कायल हूं । मैं गुलाब की पत्तियों सी सजी, आफताब की ओस से ज़री, प्रभा की पहली रोशनी सी लग रही, तुम्हारे होठों के सुर्ख मिस्ठान का कायल हूं । पलकों की भूलभुलइयां, गालों पर बनती कुइयां के दिदार का मैं कायल हूं । तुम यकिन नहीं मानोगी, तुम्हारी गेशुओं से उलझ के निकली हुई मदमस्त हवाओं में वासंतिक लालिमा होती है, सावन की भीगी-भीगी खूशबू होती है, माघ का ठंडापन और जयेष्ठ का प्यास होता है, चंदन की महक, चिड़ियों की चहक और न जाने कौन-कौन से तत्वों का संगम होता है । मैं इस संगम के व्याख्यान का कायल हूं ।
“दिल, दिमाग और दवात के संगम की उपज”

हवाओं का आसियां

धरती और आसमान के बीच हवाओं का आसियां होता है । तितली, भंवरे, जुग्नू आज सब परेशान है । इंसान पुतला फूंक रहा हैं, आज रावण का कल मनमोहन का परसो मायावती, नीतीश, गडकरी और ना जाने कौन-कौन । रावण खुशी-खुशी फूंका जा रहा हैं, लेकिन नेताओं को फूंकने पर क्फर्यू लग जाता है । हवाओं के आसियां पर कफर्यू नहीं लगाया जा सकता है, लेकिन ज़हर तो हवाओं में भी घोला जा सकता है । मत घोलो ज़हर की आसियां हवाओं का भी उजर जायें और तितली, भंवरे, जुग्नू सब परेशान रहे ।।

Saturday, January 7, 2012

तुम इतने निर्दयी कैसे

तुम इतने निर्दयी कैसे

मेरे अँसुवन नैनों के नीर

दोनों मेरे हो के भी

सावन मोती बहतें हैं

निश्छल ह्रदय

व्याकुल मन मेरा

प्रीत की आस लगाये था

तुम मधुमास

बसंत तुम फागुन

सरसों फूल सुनहरी सी

ज्येष्ठ दोपहरी आग सा झुलसा

नियत तुम्हारी जो पढ़ ली

कुंठित प्रेम

कलंक की भाषा

अभिनव छवि दिखाई थी

तुम योवन भूख की माया

मेरा प्रेम विहंगम सा

रूप रतन सब तेरे तेज

मुझपे असर ना कर पाया

विचलित हूँ

की बिसराऊँ कैसे

पर विवस नहीं हूँ उस माया से

यह मोह भंग में कष्ट है

लेकिन

तुम इतने निर्दयी कैसे

Wednesday, January 4, 2012

मुस्लिम औरतों की दयनीय स्थिति : ज़रूरत है एक आपा की

अमरजीत चौधरी

महिलाएं चाहे जिस वर्ग, वर्ण, समाज की हों, सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं, दमित हैं, पीड़ित हैं। इनके उत्थान के लिए बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने महिलाओं के लिए आरक्षण की वकालत की थी। महात्मा गांधी ने देश के उत्थान को नारी के उत्थान के साथ जोड़ा था। मुस्लिम औरतों की स्थिति सबसे बदतर है।
पहली महिला न्यायाधीश बी फातिमा , राजनेता मोहसिना किदवई , नजमा हेपतुल्लाह , समाज-सेविका -अभिनेत्री शबाना आज़मी, सौन्दर्य की महारती शहनाज़ हुसैन, नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर, पूर्व महिला हाकी कप्तान रजिया जैदी, टेनिस सितारा सानिया मिर्जा, गायन में मकाम-बेगम अख्तर, परवीन , साहित्य-अदब में नासिर शर्मा, मेहरून निसा परवेज़, इस्मत चुगताई, कुर्रतुल ऍन हैदर तो पत्रकारिता में सादिया देहलवी और सीमा मुस्तफा जैसे कुछ और नाम लिए जा सकते हैं, जो इस बात के साक्ष्य हो ही सकते हैं की यदि इन औरतों को भी उचित अवसर मिले तो वो भी देश-समाज की तरक्की में उचित भागीदारी निभा सकती हैं।
लेकिन सच तो यह है कि फातिमा बी या सानिया या मोहसिना जैसी महिलाओं का प्रतिशत बमुश्किल इक भी नहीं है। अनगिनत शाहबानो, अमीना और कनीज़ अँधेरी सुरंग में रास्ता तलाश कर रही हैं।
भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 40 प्रतिशत है, इसमें मुस्लिम महिला मात्र 11 प्रतिशत है। हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने वाली इन महिलाओं का प्रतिशत मात्र 2 है और स्नातक तक का प्रतिशत 0.81
मुस्लिम संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर मुस्लिम लड़कों का अनुपात 56.5 फीसदी है, छात्राओं का अनुपात महज़ 40 प्रतिशत है। इसी तरह मिडिल स्कूलों में छात्रों का अनुपात 52.3 है तो छात्राओं का 30 प्रतिशत है।
अनपढ़ रहकर जीना कितना मुहाल है, ये अनपढ़ ही जानते हैं। पढ़े-लिखों के बीच उठने-बैठने में, उनसे सामंजस्य स्थापित करने में बहुत कठिनाई दरपेश रहती है। मुस्लिम औरतों का इस वजह्कर चौतरफा विकास नहीं हो पाता। वो हर क्षेत्र में पिछड़ जाती हैं। प्राय:कम उम्र में उनकी शादी कर दी जाती है। शादी के बाद शरू होता है,घर-ग्रहस्ती का जंजाल। फिर तो पढ़ाई का सवाल ही नहीं। ग़लत नहीं कहा गया है कि पहली शिक्षक मां होती है। लेकिन इन मुस्लिम औरतों कि बदकिस्मती है कि वोह चाह कर भी अपने बच्चों को क ख ग या अलिफ़ बे से पहकई मुस्लिम देश ऐसे हैं जहां महिलाएं हर क्षेत्र में सक्रिय हैं। लेकिन विश्व की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले धर्म-निरपेक्ष तथा गणतंत्र भारत में उसकी स्थिति पिंजडे में बंद परिंदे की क्यों?
इसका जिम्मेदार मुल्ला-मौलवी और पुरूष प्रधान समाज ही नहीं स्वयं महिलाएं भी हैं जो साहस और एकजुटता का परिचय नहीं देतीं।
ज़रूरत है इक बी आपा की जिन्होंने अलीगढ में स्कूल कालेज की स्थापना की थी।चान नहीं करा पातीं।

Wednesday, December 21, 2011

सोशल मीडिया की निगरानी

अमरजीत चौधरी

सोशल मीडिया ने भारतीय मीडिया जगत में अपना एक स्थान बना लिया है। कभी-कभी तो लगता है कि वह पारंपरिक मीडिया पीछे छोड़ चुकी है और जल्द ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के स्वप्निल संसार को छोड़ कर आगे निकल जायेगी।
उसकी यह संभावना और लोगों तक सीधी पहुंच केवल सत्ताधारी ही नहीं बल्कि उन लोगों को चिंतित किये हुए है जो जनमत को अपनी ताल पर थिरकते देखना चाहते हैं। लोकतंत्र होते हुए भी भारत में अंग्रेजों के बनाये कानूनों की आड़ में सूचनाओं को छापने और छिपाने का खेल आजादी के बाद भी दशकों तक चला है।
जूलियस असांजे ने सूचनाओं को फाइलों की गिरफ्त से निकाल कर लोगों तक पहुंचाने का काम किया तो तमाम सरकारें उसके खिलाफ खड़ी हो गयीं। लेकिन असांजे के इस दुस्साहस ने गली-मुहल्ले में ऐसे किशोरों की फौज खड़ी कर दी जो अपने हाथ लगी ननिहीं सी जानकारी को भी इंटरनेट के माध्यम से दुनियां भर में बांटने को मचल उठे।
इस बेचैनी को निकलने का मार्ग मिला जब वेब मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ। सबसे पहले पत्रकारों की नयी पीढ़ी ने इसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और बाद में बड़ी संख्या में नागरिक भी इससे जुड़ते गये। पहले ब्लॉग और उसके बाद ऑरकुट, फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की असीम संभावनाओं के द्वार खोल दिये। बेहद कम समय में बहुत अधिक लोकप्रियता पाने का कारण था इसका सस्ता और सर्वसुलभ होना। साथ ही यह ऐसा माध्यम बन गया जिसमें बतकही के लिये पूरी गुंजाइश थी, भाषा और भावों का, छन्द और व्याकरण का कोई बन्धन न था।
मीडिया में छपने वाले आंकड़ों में देश की सुनहरी तस्वीर और मजबूत होती अर्थव्यवस्था की खबरे छपती थीं तो मंहगाई से जूझ रहा नागरिक यह संदेह तो करता था कि कहीं-न-कहीं दाल में काला है किन्तु कसमसाने के अलावा कुछ भी कर सकना उसके लिये असंभव था। लेकिन सोशल मीडिया में अपनी बात कहने के साथ ही अपने विचार से सहमत लोगों को ढ़ूंढ़ निकालना भी अत्यंत सरल हो गया।
जल्दी ही राष्ट्रीय मुद्दों पर समान रूप से सोचने वाले लोगों की गोलबंदी होने लगी और सोशल मीडिया एक आंदोलन का आधार बन गया। सोशल मीडिया के माध्यम का उपयोग कर मध्य एशिया के देशों में परिवर्तन की जो लहर चली उसने दुनियां भर सरकारों को चौकन्ना कर दिया। भारत सरकार भी उस पर प्रभावी नियंत्रण की योजना बनाती इससे पहले ही अन्ना की टीम ने इसका पहला सफल प्रयोग किया। जंतर-मंतर पर अन्ना के पहले प्रदर्शन के बाद हुए रामदेव के आंदोलन को सरकार ने जिस तरह कुचलने की कोशिश की उससे रामलीला मैदान में अन्ना के अनशन को धार मिली। रामदेव के समर्थकों पर हुई हिंसा के विरोध में सोशल मीडिया पर टिप्पणियों की बाढ़ आ गयी। यही बाढ़ बाद में अन्ना के समर्थन में तब्दील हो गयी।
अब जबकि अन्ना की टीम ने सरकार को दोबारा घेरने की कोशिश शुरू कर दी है, सरकार चाहती है कि सोशल मीडिया की मुश्कें कुछ इस तरह कस दी जायें ताकि आने वाले समय में वह अन्ना के लिये प्लेटफॉर्म न बन सके।
इसी कवायद का एक हिस्सा था संचार मंत्री सिब्बल द्वारा सोशल मीडिया साइट के संचालकों को बुला कर दी गयी कपिल सिब्बल की घुड़की। चिन्ता की बात यह है कि इन साइट संचालकों ने भारत में इसकी चर्चा भी नहीं की। न ही मंत्रालय के भीतर की हलचल सूंघने वाले खोजी खबरियों ने इसे छापा। वाशिंगटन पोस्ट में छपने के बाद भारत की मीडिया में इस पर बावेला मचा।
सोशल साइटों पर लगाम लगाने की सिब्बल की कोशिश को व्यक्तिगत प्रयास नहीं बल्कि सरकार की नीति ही मानना चाहिये। यद्यपि सिब्बल द्वारा उठाये गये प्रश्नों को भी महत्व दिया जाना चाहिये। उनके द्वारा उठाये गये नैतिकता और मूल्यों के सवाल नकार दिये जाने योग्य नहीं हैं और उन पर गंभीर चिंतन आवश्यक है। किन्तु यह कवायद तब अर्थ खो देती है जब लगता है कि यह सरकार की ईमानदार कोशिश के बजाय नागरिकों की जबान बंद करने की कोशिश अधिक है।
यदि सरकार को लगता है कि वह इसमें सफल हो सकेगी तो इसकी संभावना बेहद कम है। इसलिये नहीं कि पूरा देश अन्ना के समर्थन में आ खड़ा हुआ है अथवा मध्य एशिया के देशों की तरह क्रांति पर उतर आया है, बल्कि इसलिये, क्योंकि मीडिया और सरकार की लगातार बेरुखी के बाद आम नागरिकों के हाथ एक ऐसा माध्यम आया है जहाँ उनकी समस्याओं का हल नहीं है लेकिन कम से कम बिना किसी प्रतिबंध के अपनी बात कह सकने की आजादी तो है।

Tuesday, December 6, 2011

मल्टीब्रांड एफ़डीआई यानी चोर छिप गया भागा नहीं है!



अमरजीत चौधरी


ममता को पैकेज देकर जल्दी बिल्ली थैले से बाहर आ जायेगी। खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का भूत ममता की तृणमूल कांग्रेस के अड़ जाने से फिलहाल छिप गया है लेकिन यह मानना खुद को धेखा देना होगा कि यह हमेशा के लिये भाग गया है। दरअसल कम लोगों को यह अंदर की बात पता है कि जून में जब वित्तमंत्रि प्रणव मुखर्जी अमेरिका गये थे तो वहां अमेरिकी विदेशमंत्री टिमिथी गैटनर ने उनसे कहा था कि हम बैंकिंग, इंश्योरेंस और मल्टी ब्रांड रिटेल में भारत को तेजी से आगे बढ़ता देखना चाहते हैं। मज़ेदार बात यह है कि आज जो भाजपा विपक्ष में होने की वजह से यूपीए के इस क़दम का जमकर विरोध कर रही है वह 1998 से 2004 के बीच एनडीए सरकार के दौरान बढ़ चढ़कर इस तरह की आर्थिक नीतियों का खुलकर समर्थन करती रही है। हालत यह थी कि 2002 में एनडीए की वाणिज्य और उद्योग मंत्री मुरासोली मारन ने ग्रुप आफ मिनिस्टर्स के सामने एक नोट पेश किया था जिसमें रिटेल में शत प्रतिशत विदेशी निवेश की सिफारिश की थी। इतना ही नहीं 2004 के चुनाव में एनडीए के विज़न डाक्यूमेंट में भी रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात मौजूद थी। सच यह है कि उदारीकरण में जब एक ओर हमारी मल्टीनेशनल कम्पनियां विदेशों में जाकर रिटेल कारोबार में सिक्का जमा रही हैं तो हम अपने देश के दरवाजें दूसरों के लिये कैसे बंद रख सकते हैं? दरअसल विदेशी कम्पनियां वालमार्ट, कार्फू और टेस्को दूसरे देशों में जो गुल खिला चुकी हैं उनसे डर लगना नेचुरल ही है। यह ठीक है कि कुछ समय तक किसान को अपनी उपज का बढ़ा हुआ दाम और उपभोक्ता को सस्ता सामान मिलेगा लेकिन यहीं एक पेंच है कि बाद में प्रतियोगिता में अन्य देसी कम्पनियों और व्यापारियों को ठिकाने लगाने के बाद इन भीमकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मोनोपोली हो जाना तय है। जहां 2020 तक 80 लाख से एक करोड़ नये रोज़गार पैदा करने का दावा किया जा रहा है वहीं यह भी निश्चित है कि 6 करोड़ फुटकर दुकानदारों को यह फैसला निगल भी जायेगा। हमारे यहां कुल रिटेल का 60 प्रतिशत हिस्सा खाने पीने का सामान है जो लगभग 11000 अरब रुपये का होता है। एक सर्वे बताता है कि महानगरों में लगभग 68 प्रतिशत अनाज दाल मसाले और 90 प्रतिशत फल सब्ज़ियां दूध मांस और अंडे छोटी दुकानों से ख़रीदे जाते हैं। मीडियम क्लास सिटी में यह आंकड़ा क्रमशः 79, 92, और 98 है। इसका मतलब यह है कि पहले से देश में मौजूद रिलायंस स्पेंसर और बिग बाज़ार जैसे बड़े देसी डीलर भारतीयों को अपनी तरफ नहीं खींच पाये हैं। इनका हिस्सा आज भी मात्र 2 प्रतिशत बना हुआ है। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि छोटा दुकानदार जहां औसत 280 मीटर की दूरी पर उपलब्ध है वहीं संगठित क्षेत्र के बड़े शॉपिंग माल डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर हैं। मल्टी ब्रांड रिटेल से महंगाई घटने का तर्क भी गले नहीं उतरता क्योंकि भारत में देसी मल्टी ब्रांड रिटेलर आने के बावजूद पिछले साल उल्टे महंगाई और बेकाबू हो चुकी है। भंडारण और आपूर्ति का ढांचा बने बिना किसानों को भी इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा। देखने की बात यह होगी कि क्या भारत जैसे विशाल बाज़ार में मल्टी नेशनल कम्पनियों असंगठित दुकानदारों से प्रतिस्पर्धा करने को प्रबंधन और भंडारण में भारी पूंजीनिवेश करने को तैयार होती हैं या नहीं क्योंकि यह तो तय है कि अब चाहे जितना शोर मचाया जाये लेकिन जब देश ने एक तरह से शराब जैसी पूंजीवादी नीति स्वीकार कर ही ली है तो उसका नशा हुए बिना तो नहीं रहेगा। हमारी सरकार पर ये लाइनें कितनी सटीक बैठती हैं-
फूल था मैं कांटा बनाकर रख दिया,
और अब कहते हैं कि चुभना छोड़दे।

Friday, December 2, 2011

गुजरे पल की कसक


यूँ सोचता हूँ ..
कि पल जो गुजरतें हैं

वो मेरे थे कभी

अब भी आता हुआ
पल
मेरा ही है
फिर ...
क्यूँ तलाशता हूँ

गुजरे पल को अक्सर

उस फिजा को
उस महक को

उस रवानगी को

जो हमने बनाई थी

ये बात, उफ़ ये बात
बीतते पल के साथ महसूस होती है
कि पल-पल की खासियत है अपनी
मगर फिर भी ...
गुजरे पल की कसक
आने वाले पल से ज्यादा होती है

Monday, November 28, 2011

उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व घमासान

अमरजीत चौधरी
उत्तर प्रदेश राज्य में होने वाले विधानसभा के आम चुनाव वैसे तो हमेशा ही पूरे देश के लिए उत्सुकता का विषय बने रहते हैं। परंतु इस बार खासतौर पर इन चुनावों पर पूरे देश की नज़र टिकी हुई है। इसके कई कारण हैं। एक तो यह कि प्रदेश की राजनीति में यह पहला मौका था जबकि पिछले चुनावों में बहुजन समाज पार्टी अपने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई तथा इन दिनों अकेले दम पर अपना कार्यकाल पूरा कर रही है। लिहाज़ा देश की नज़र इस बात पर है कि ‘‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’’ की बात करने वाली बसपा तथा उसकी नेता एवं प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अपने उपरोक्त नारों पर अमल कर पाने में कहां तक खरी उतर पाई हैं।
और यह भी कि बहुजन हिताय की बात करते-करते सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय की बातें करने का उन्हें लाभ हुआ है या नुकसान यह भी आने वाला चुनाव ही तय करेगा। दूसरी ओर विपक्षी दलों में मची इस बात की प्रतिस्पर्धा पर भी सभी की नज़रें टिकी हैं कि आखिर कौन सा दल स्वयं को मुख्य विपक्षी दल के रूप में राज्य में स्थापित कर पाता है। फिलहाल चुनाव पूर्व गठबंधन के नाम पर सिवाय कांग्रेस व राष्ट्रीय लोकदल में हुए समझौते के अन्य किसी राजनैतिक दल के साथ किसी भी पार्टी के चुनाव पूर्व गठबंधन किए जाने का कोई समाचार नहीं है। परंतु चुनाव का समय नज़दीक आते-आते इस प्रकार के होने वाले किसी गठबंधन से इंकार भी नहीं किया जा सकता।
बहरहाल, चुनाव पूर्व जैसा कि होता चला आ रहा है सत्तारुढ़ दल अर्थात् बहुजन समाज पार्टी अपने तरकश के सभी तीर चलाने में मसरूफ है। पिछले दिनों बड़े ही आश्चर्यजनक तरीके से राज्य विधानसभा का एक दिन का सत्र बुलाकर चंद मिनटों में ही लेखानुदान पारित करा दिया गया तथा प्रदेश को चार भागों में विभाजित करने जैसा अति महत्वपूर्ण एवं अतिसंवेदनशील प्रस्ताव भी आनन-फानन में पारित कर राज्य के बंटवारे संबंधी गेंद केंद्र सरकार के पाले में डाल दी गई। इसके अतिरिक्त बहुजन समाज से पटरी बदलकर सर्वजन समाज की ओर रुख करती हुई बसपा ब्राह्मण मतों को आकर्षित करने के लिए एक बार फिर तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है।
इन सबके अतिरिक्त टिकट बंटवारे को लेकर भी पार्टी में भीषण घमासान की खबरें हैं। हालांकि अभी चुनाव आयोग द्वारा राज्य विधानसभा चुनाव के संबंध में न तो कोई तिथि घोषित की गई है न ही इस संबंध में कोई अधिसूचना जारी हुई है। परंतु अभी से लगभग सभी राजनैतिक दलों द्वारा अपनी-अपनी पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा किए जाने का काम शुरु कर दिया गया है। खबरों के अनुसार बसपा में लगभग तीन दर्जन विधायकों को पार्टी इस बार चुनाव मैदान में पुनरू उतारने नहीं जा रही है। ऐसे में ज़ाहिर है इनमें से अधिकांश विधायकों ने अभी से बागी तेवर दिखाने शुरु कर दिए हैं और ऐसे विधायक अब दूसरी पार्टियों की ओर देख रहे हैं।
ज़ाहिर है टिकट वितरण के इस वातावरण में एक बार फिर सौदेबाज़ी की भी पूरी खबरें आ रही हैं। समाचारों के अनुसार बसपा के जिन विधायकों को इस बार पार्टी के टिकट से वंचित रखा जा रहा है उससे दहशत खाए हुए अन्य पार्टी विधायक सभी शर्तों को पूरा कर टिकट लेने की जुगत में लग गए हैं। उधर कांग्रेस पार्टी हालांकि अपने युवराज राहुल गांधी को तुरुप के पत्ते के रूप में मुख्य चुनाव प्रचारक की हैसियत से मैदान में उतारकार पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की आस लगाए हुए है। परंतु हकीकत में कांग्रेस को राज्य में भारी गुटबाज़ी का भी सामना करना पड़ रहा है।
बड़े आश्चर्य की बात है कि अन्ना हज़ारे तथा बाबा रामदेव जैसे स्वयंभू भ्रष्टाचार विरोधी श्पुरोधा्य उत्तर प्रदेश से ही अपने भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का सार्वजनिक शंखनाद करने जा रहे हैं तो दूसरी ओर इन सबसे बेपरवाह राजनैतिक दल व इनके कुछ नेता टिकट वितरण जैसे सुनहरे अवसर को धन उगाही के सर्वोत्तम माध्यम के रूप में अपनाए जाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। इन घटनाओं को उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व मचे घमासान का मात्र श्रीगणेश ही समझा जाना चाहिए।

Saturday, November 26, 2011

ये मुस्कुराहट तो वो नही

ये तन्हाई कितनी प्यारी है

शायद मेरे महबूब से भी ज्यादा


ये ख़ामोशी कितना कुछ कहता है

शायद मेरा महबूब भी जो ना कह सका
इस आवारगी में भी कितना सुकून है

शायद सादगी जो ना कर सका
ये मुस्कुराहट तो वो नही

जिसके खिलते ही लव गुलाब बनते थे
ये आह्ट तो वो नही

जिसके सुनते ही दिल में चिराग चलते थे

ये तस्वीर बनावटी है
या फिर ...

बनावटीपन ही तम्हारी छवि है

Sunday, October 9, 2011

कार्यपालिका की निष्क्रियता बनाम न्यायपालिका की सक्रियता

अमरजीत चौधरी


यह बहस आजकल काफी तेज़ होती जा रही है कि क्या न्यायपालिका जानबूझकर सरकार के नीतिगत मामलों में अवांछित दख़ल दे रही है या फिर कार्यपालिका की निष्क्रियता और बढ़ते भ्रष्टाचार के कारण अदालतों को संविधान की रक्षा और जनहित में सक्रिय होना पड़ रहा है। आमतौर पर यह माना जाता है कि कोर्ट कई बार समाज और सरकार के बीच पैदा होने वाले तनाव को कम करने के लिये सेफ्टी वाल्व’ का काम भी करता है।


अगर गौर से देखा जाये तो पिछले कुछ समय में एक के बाद एक ऐसे निर्णय अदालतों से आये हैं जिनसे सरकार को न केवल नीचा देखना पड़ा है बल्कि जनता ने राहत की सांस भी ली है। मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश में इलाहबाद हाईकोर्ट ने जहां एक के बाद एक माया सरकार के कृषि भूमि अधिग्रहित करने के कई फैसलों को अवैध ठहराकर पलट दिया जिससे यूपी सरकार की काफी किरकिरी हुई वहीं सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के जयपुर में दो दशक से चल रहे 552 बीघा ज़मीन के एक मामले में यह एतिहासिक फै़सला दिया कि सरकार सार्वजनिक उद्देश्य के लिये अधिग्रहित भूमि को अन्य लाभार्थियों को फिर से आवंटित नहीं कर सकती।


इससे पहले उच्चतम न्यायालय सरकार को देश में एक तरफ भूख से लगातार मौतें होने और दूसरी तरफ बड़ी मात्रा में खुले में रखे अनाज के सड़ने से बर्बाद होने पर फटकार लगाते हुए यह आदेश दे चुका है कि इस गेहूं को खराब होने से बचाने में अगर सरकार अक्षम है तो क्यों न इसको गरीबों में निशुल्क वितरित कर दिया जाये। ऐसा ही एक निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार के अवैध सलवा जूडुम अभियान के खिलाफ देते हुए कहा है कि बिना किसी प्रशिक्षण और नियम कानून के जनता के कुछ लोगों को विशेष पुलिस अधिकारी बनाकर हथियार देना और माओवादियों से निबटने के नाम पर मनमानी की छूट देना असंवैधनिक है जिसे तत्काल रोका जाना चाहिये। मज़ेदार बात यह है कि इस अवैध और विवादास्पद अभियान में केंद्र सरकार भी मानदेय में 80 प्रतिशत का योगदान कर रही थी। गुरूल्लिओं की तरह काम कर रहे इन 5000 विशेष पुलिस अधिकारियों पर नक्सलवाद के सफाये के नाम पर करीब 600 गांवों को लूटने और जलाने सहित मानवाधिकार उल्लंघन के ढेर सारे आरोप लगाये जाते रहे हैं लेकिन सरकार ने सशस्त्रा सेना विशेषाध्किर अध्नियम की तरह इस मामले में भी आंखे बंद कर रखी थी।


वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामजेठमलानी की एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने जब काले धन पर पूर्व न्यायधीश की देखरेख में विशेष जांच दल का गठन किया तो सरकार बौखला गयी। माननीय न्यायमूर्ति एस एस निज्जर और न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी की बैंच ने इस मामले में सख़्त रूख़ अपनाते हुए यहां तक कहा कि उदारवादी आर्थिक नीतियां देश को लूट और लालच की तरफ ले जा रही हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट योगगुरू बाबा रामदेव के द्वारा दिल्ली के रामलीला मैदान में शांतिपूर्वक किये जा रहे अनशन को सरकार द्वारा पुलिस के ज़रिये बर्बर ढंग से कुचलने के खिलापफ भी तीखी टिप्पणी करते हुए जवाब तलब कर चुका है। थोड़ा और पीछे मुड़कर देखें तो सरकार ने भी एक तरह से पूरी बेशर्मी पर कमर बांध रखी है वह लगातार यह दावे करती रहती है कि वह भ्रष्टाचार को ख़त्म करने को लेकर पूरी तरह गंभीर है लेकिन जब कानून के काम करने की बारी आती है तो वह आरोपियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। पूर्व केंदीय संचार मंत्री ए राजा का मामला हो या विवादास्पद सीवीसी पी जे थामस, यूपीए सरकार के प्रमुख घटक द्रमुक प्रमुख की लाडली बेटी कनिमोझी की गिरफ़्तारी की बात हो या कॉमन वैल्थ गैम्स घोटाले के प्रमुख आरोपी सुरेश कलमाड़ी को जेल भेजने की मजबूरी मनमोहन सरकार ने एड़ी से चोटी तक का ज़ोर इनको बचाने के लिये लगाया लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को हड़काते हुए बार बार उसकी काहिली पर उंगली उठाई तब कहीं जाकर सरकार और कॉंग्रेस ने इन आरोपियों से पीछा छुड़ाया। जिससे सरकार की कथनी करनी में अंतर के कारण ही कोर्ट को सकि्रय होना पड़ रहा है। ऐसे अनेक मामले देखने में आते हैं जब लोग गंभीर अपराधों की भी एफआईआर थानों में दर्ज नहीं किये जाने पर मजबूर होकर अदालतों में जाते हैं।

Monday, September 13, 2010

हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो

हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी कारवां हो
हम चाहते हैं हिन्दी जां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो



है जन से कहना, जनमत बनाना
हिन्दी को अपनी प्रतिष्ठा दिलाना
हम भारत के हैं, नये भारत बनाना
हिन्दी भाषा जन साधारण तक पहुचाना
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी हिन्दुस्तान हो



कठिनाईयों से भरी रास्ता हैं
हिन्दी का अभी जो दूर्दशा चल रहा है
बहुत सोचने की ये मंथना है
भारतीय हैं हम, फिर क्यूँ इंग्लिश यहां हैं
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो


परछाइयों में हमें है चलना
भूल के सब कुछ, रौशन हिन्दी को है करना
आओ मिलाओं मेरे हाथ से हाथ
हिन्दी पुछेगी फिर इंग्लिश से औकाद
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी हिन्दुस्तान हो


ये राष्ट्रभाषा हिन्दी हमारी
सत-सत नमन हम हैं तेरे आभारी
तुम अस्मिता हो मेरे देश की
तुम पिता हो मेरे संदेश की
हम चाहते हैं हिन्दी निशां हो
हम चाहते हैं हिन्दी ये जहां हो

Wednesday, September 8, 2010

इश्क गर एहसास है

इश्क गर एहसास है
तो फिर तुम्हें क्यूं ना होता है
इश्क गर जज़बात है
तो फिर दिल से क्यूं ये होता है

हम तो पुरानी यादों में भी जी लें
दिल है कि देखते ही धड़क लेता है
अहसान मानो मेरे दिल का मेरे महबुब
दूर हो मेरी दुनिया से फिर भी
ख्वाब तेरा ही रात-दिन क्यूं ये संजोता है

इश्क गर एहसास है
तो फिर तुम्हें क्यूं ना होता है
इश्क गर जज़बात है
तो फिर दिल से क्यूं ये होता है

Friday, August 20, 2010

एक अनजाना सा ख्वाब देखा है...


आज मेरी सुबह का सूरज कहीं खो गया है....भीषण गर्मी के इस आग उगलते धूप के उजाले में भी आज मुझे...गुमनामी का अंधेरा और जीने का डर अनायास ही सता रहा है...बचपन की वो यादें और उन यादों के पीछे छिपे इरादों को याद कर के दिल रोना चाहता है...लेकिन मां कि आंचल का सहारा ना मिलने के कारण ये आंखे भी बेबस होकर चुप्पी साध चुकी है...अजीब सी इक हलचल मची है दिल में....शायद कोई आने वाला है मेरी जिंदगी में...या फिर कोई बिछड़ने वाला है मुझसे...मैंने तो एक हसीन से ख्वाब को पाल रखा था दिल में...फिर ऐसी घबराहट क्यों जो दिल को कचोट रही है ?? क्या मेरा ख्वाब अब भी ख्वाब ही रह जाएगा? कल रात का घनघोर अंधेरा मैं कैसे भूल पाउंगा...हर रोज की तरह मेरी तन्हाई और परछाईं मेरे साथ थी...लेकिन खुद की परछाई के साथ चलने में मैं डर क्यों रहा था ? क्या अब मेरी तन्हाई ही मेरी अपनी रह गई है या फिर उसका भी साथ छूटने वाला है...अजीब सा सवाल है मन में...लेकिन नादान हूँ मैं जो अपने ही सवालो से उसका जवाब मांगने कि जिद्द कर रहा हूँ पता है मुझे कि ये महज एक पागलपन है लेकिन किसी और से जवाब मांगने के ख्याल से डर लग रहा है मुझे...लेकिन उसी अंजाने ख्वाब को दिल से याद करके एक अंजानी सी हिम्मत भी आ जाती है मुझमें...जो अब भी मेरे उस ख्वाब को जिंदा रखे हुए है कि मेरी जिंदगी में कोई आने वाला है जो मुझे सबसे प्यारा होगा....काश मैं उस पल को महसुस कर पाता और जी पाता...आज के अकेलेपन से एक बात तो मैंने सीख ली है कि जिंदगी एक अंधेरी गुफा के समान है लेकिन एक छोर पर उजाले कि एक किरण हमेशा हमारा इंतजार कर रही होती है...फिर भी हम बेबस होकर अपने ही सवालों के उमड़ते-घुमड़ते बादलो में गोते लगाते रहते हैं...हमें लगता है कोई दूर समंदर से एक सीप हमारे लिए एक मोती लेकर आएगा जो हमारे जिंदगी को चमकाएगा...लेकिन ये एक महज ख्वाब है..और झूठ बोलते हैं वो लोग जो कहते हैं कि हर सपना सच और अपना होता है....सच कहूँ तो ख्वाब तो सिर्फ टूटने और इंसानो के दिल को तोड़ने का जरिया मात्र है...इंसान हर सुबह कि किरण के साथ ख्वाब देखता है और हर ढ़लते सूरज के किरण उसकी ये उम्मीदों का गला घोंट देती है...इसलिए झूठे हैं वो जो कहते हैं कि ख्वाब रात के आगोश में पलते हैं...मैने तो हर उजाले में एक अनजाना सा ख्वाब देखा है...

Saturday, August 14, 2010

दी थी इतनी कुर्बानिया फिर भी भारत आजाद ना रहा॥

दुनिया में अब इंसानियत का ताज ना रहा..
दी थी इतनी कुर्बानिया फिर भी भारत आजाद ना रहा..
घोटालों नें सेंध लगा दी..
भ्रष्टाचार का साया है..
फसाद के कर्कश स्वर से...
मधुर युवा का कोई आवाज ना रहा...
दुनिया में अब इंसानियत का ताज ना रहा...
दी थी इतनी कुर्बानिया फिर भी भारत आजाद ना रहा॥
दुनिया भर की नजरे हम पर...
कुंठा से इतराती है...
हम है इतने लाचार कि अब...
दुश्मनी धुंधली पड़ जाती है...
जुवान पर तो 'जय हो' है पर...
दिलो में माँ का परवाज़ ना रहा...
दुनिया में अब इंसानियत का ताज ना रहा...
दी थी इतनी कुर्बानिया फिर भी भारत आजाद ना रहा...
सोने की चिड़िया थें पहले...
ठाठ से राज करतें थें महलें...
दिल में झुठा प्यार है अब भी....
पर एहसान किसी का अब उधार ना रहा...
दुनिया में इंसानियत का नाम ना रहा...
दी थी इतनी कुर्बानिया फिर भी...
अपना भारत अब आजाद ना रहा....

बस खिंची गई एक संकड़ी सी LOC है

63वें स्वतंत्रा दिवस की हार्दिक शुभकामना के साथ बहारो के बोलते शब्द...........


बहारें लौट के आई है
देखने ज़लवा तेरा
लेकिन उन्हें क्या पता
कि भारत-पाक अब एक नही
कहानी 1947 के अगस्त की है
ज़ख्म 2010 के अगस्त तक वही है
जुदा ना रुप-रंग ना रोश्नी है
बस खिंची गई एक संकड़ी सी LOC है
ये वही पाक है
जो हिन्दुस्तान था कभी
लिया स्थान
पाकिस्तान बना लिया
मगर क्या चॉद-सितारा
जो पहचान बनी है जिसकी
कभी मांगा हक उससे
अपने यहां रहने की
बड़ा अफसोस है
इन बदमस्त हवाओं को
सरहदो से नही रिश्ता है फिर भी
अमन और सितम दोनो में कितना फ़र्क है
महसुस करती है ये हवाएं एक साथ ही
कभी इन हवाओं में गुलामी की जंजीर थी
बहारों के खुश्बुओं में आजादी की दुआ रहती थी
अब तो है स्वराज देश में
मैं बहार हूं
झुमना चाहता हूं
मगर लाहौर से कश्मीर आते-आते रुक जाता हूं
मुझे भी झुमने दो
बहार बनके घूमने दो
रोक दो दहशती कारनामो को
बहार लौट ना पाये इस दफ़ा
बिन देखे ज़लवा तेरा
बहारें लौट के आई है
देखने ज़लवा तेरा
लेकिन उन्हे क्या पता
कि भारत-पाक अब एक नही

Friday, August 13, 2010

मीडिया इतनी डरी सहमी क्यूं है ?

मीडिया पे हमेशा वाद-विदाद चलता रहता है । खासकर मैन स्टीम मीडिया को लेकर बहस का सिलसिला तो कभी थमता ही नही । मीडियाकर्मी अपने आप को लोकतंत्र का प्रहरी मानते हैं । उन्हे लगता है कि सवाल पुछना ही ‌उनकी फितरत है । चाहे संसद का गलियारा हो या फिर सड़क का चौक-चौराहा । मीडिया लगातार हशिये पर जा रही है । इसके पिछे एक खास वज़ह भी है । एक तो मीडिया अपने मापांक के पैमाने पे खड़ा उतरने के लिए बेकरार रहता है । जिसे मीडिया के ही शब्दो में टीआरपी कहते है । यानि टेलिविजन रैंटिंग प्वाइन। तो वहीं दूसरी तरफ बाजार और लोगो की मांग का बहाना बना कर अपने पर उठ रहे सवाल को खारिज करता है । लेकिन इस बात की वास्तविकता ये नही है । सबसे पहले तो मीडिया में अब वो जजवा नही रहा । जिस जजवा के लिए मीडिया का निर्माण किया गया । हरेक मीडिया संगठन किसी ना किसी पॉलिशी के तहत कार्य करता है । और आप को बता दू कि जब तक कोई भी कर्मचारी इन पॉलिशियों से रु-ब-रु नही हो पाता है, तब तक वह उस संगठन के लिए बेकार जैसा रहता है । खैर इन पॉलिशियों को समझने में ज्यादा समय नही लगता है । लेकिन जिस बात को लेकर आज का मंथन है वो ये कि आखिर क्यो मीडिया इतनी डरी सहमी है........ । क्यो आज मीडिया अपना दर्शक वर्ग नही बना पा रही है....... । क्यो मीडिया को क्लाइमेक्स की जरुरत है ......क्यो मीडिया के चैनल हर खबर से अपने आप को स्थापित करना चाहता है ......क्यो मीडिया को ऐसा लगता है कि ब्रेक के बाद दर्शक उनके चैनल के साथ नही बने रहेगें .....क्यो कहा जाता आप बने रहे है ब्रेक के बाद भी......इन सब के पीछे जो एक तर्क कार्य करता कि मीडिया डरी सहमी हुई है । शायद यही वजह है कि प्राइम टाइम में बड़े-बड़े चैनल फिल्मो का प्रोमोशन करता है ।और एक दर्शक वर्ग बनाना चाहता है । लेकिन इतने से ही काम नही चल पाता है तो फिर धारावाहिको क्लाइमेक्स और कॉमेडी, गीत संगीत के कार्यक्रम को समाचार का रुप देकर परोसा जाता है । मीडिया के इन चैनलो के लिए भूत भी खास तरह के न्यूज बनाता है खासकर तब जब प्रतिद्वंदी चैनल के हाथ कोइ पुखता समाचार हो । ऐसे हालात में सवाल ये उठता है कि मीडिया अपने गिरते स्तर के लिए किसको जिम्मेदार माने । उस मीडियाकर्मी को जो नये आते है और थके हारे से महसुस करते हैं । या फिर उन मीडियाकर्मीयों को जो मीडिया में कई दशक से कार्य कर रहें हैं । और कॉर्पोरेटरों के हित को देखते नीति का निर्माण करते हैं । सच्चाई ये है कि मीडिया खुद में एक ऐसा बाजार बन गया है जहां हर कुछ बेचा जाता है । खासकर समाचारों को बेचना यहां मुख्य रुप से होता है । समाचारो को बेचने के लिए एक खास अंदाज एक खास आवाज और एक खास विषय चुना जाता है । इसके कई उदाहरण भी है । जैसे किसी मुद्दा को बहस बना देना या फिर किसी बहस को मुद्दा के तौर पर पेश करना । आये दिन जिस तरह से बॉलिबु़ड वाले मीडिया चैनल को फिल्मो के प्रोमो के लिए इस्तमाल कर रहें हैं लगता है कि नही है कि ये हिन्दुस्तान का न्यूज चैनल है । न्यूज चैनल का ये MTV रुप लोगो को चैनल और इन्टरटेनमेंट चैनल के फर्क को खत्म लगभग खत्म कर दिहा है । शायद यही वजह है कि मंहगाई, अशिक्षा बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, गांव-देहात , और प्रशासनिक अन्याय कभी मुख्य खबर नही बन पाती है ।

Friday, July 30, 2010

कभी किसी रोज

कभी किसी रोज
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा
छुपा लेना अपने सारे जज्बातों को
क्योकि.....
बयां-ए-जज्बात ना जाने क्या कह देगें
और फिर मैं चाहता भी तो नही
कि....
यादों की तस्वीर फिर से उभरे
सांसों में फिर से वो तुफान हो
मिलने की व्याकुलता
और होंठो पे मेरा नाम हो
क्योकि.....
ये सब तो बस
एक वहम सा है

कभी किसी रोज
ये वहम टुटेगा
एहसास तुमसे पुछेगा
पास आकर तुम्हारे दिल के
दिल की हर बात तुमसे पुछेगा

Saturday, July 17, 2010

बेवफाई बेहतर है बेइमानी से

नये शहर में रौशन आया तो लगा नया सवेरा होगा....लेकिन ये तो वही सुबह है । हल्की-हल्की किरणों के साथ जागता सुरज....और मध्यम होते शाम में रात की आगोश में सोता सुरज....रात भी वही है, चॉद भी वही है, सितारों की चमक और ख्वाबों का जहां भी वही है । फिर क्यूं इतना बनावटीपन है इस शहर में ?
मैं बात कर रहा हुं दिल्ली की । दिल्ली में बहुत लोगों से जान पहचान हुई । कुछ तो कॉलेज में और कुछ कॉलेज से बाहर । कोई खास बनना चाहा और शायद इसमें वो सफल भी हुआ... लेकिन खास का मतलब यहां सिर्फ उसके लिए जुगाड़ होता है । जुगाड़ से मतलब है रिश्तों में मुनाफे का हिसाब । ये मुनाफा कई तरह के होते हैं । अगर आप इस तरह के मुनाफे से वाकिफ़ हैं तो शायद मेरे कहने का मतलब समझ पा रहे होंगें । खैर रिश्तों में हिसाब-किताब करना ही बेइमानी है ।
शायद यही वज़ह है कि बेवफाई बेहतर है बेइमानी से....और हम तो ये भी मानते हैं कि “ अच्छा हुआ सनम कि...मैं बेवफा हो गया, वफादार तो कुत्ते हुआ करते हैं ’’
कितने वफादार कुत्ते को तो मैंने भी देखा है । लेकिन क्या भौंकने भर से वफादारी होती है ? नही ना.........
क्षणिक भर का सुख बहुत दुखदायी होता है । ये जानते हुए भी क्षण भंगुर संसार में रम जाना कितना आश्चर्यजनक है । नये शहर में पुरानी बातें अजीब लगती है । पर हमें ये मान के चलना चाहिए कि शहर कोई सा भी हो मनुष्य का स्वभाव एक सा ही होता है । जिंदगी के राह चलते-चलते एक रौशन ख्वाब से टकरा गया था मैं । मौजो के इस सफर में उफान सा छा जाता है, जब उस हंसी पल में गोते लगाता हुं । सफर के इस हकीकत को अनचाहे ही कोई समझा गया था मुझे । शायद यकीं था उसे खुद पे इतना मेरा सफर था लम्बा जितना ।
“उजाले अपनी यादों का साथ ही रहने देना
जाने किस गली में जिंदगी की शाम ढ़ल जाए”



ये अल्फ़ाज नही मुकमल्ल एक कहानी है । वो रौशन ख़्वाब यही अल्फ़ाज बनके मेरे ज़ेहन में आज भी अभिनव है । लेकिन जिंदगी के इस अनजाने डगर में, मैं यूहीं चला जा रहा हूं । ना रास्तों का इल्म है, ना मंजील की ख़बर । गुमनामी के इस जहां में हस्तें-मुस्कुरातें, ठोकर खाते, गिरते-सम्भलतें खुद की परछाईं का पिछा किये जा रहा हुं । डर है कहीं जिंदगी के इस दौड़ में रफ्तार से समझोता ना करना पड़ जाये । फिर भी यकीं है कि इस अभिनव जगत में ये रौशन भी कभी मील का पत्थर साबित होगा ।


“अकेला चला था....अकेला चलूंगा
जिंदगी के सहारे.....ना दो साथ मेरा
कभी तो मैं....खुद को साबित करुंगा
सहज़ मिल सके....वो नही लक्ष्य मेरा
बहुत दूर है मेरे....निशां का सवेरा
अगर थक गये हो....तो तुम लौट जाओ
गगन के सितारे....देगें साथ मेरा ”

Thursday, July 1, 2010

मौजो के तेरे शहर में....इक मकां अपना भी होगा....




धड़कने जब साथ न देंगी,पर याद तेरी आती रहेगी,थम जायेगा दुनिया का कारवां'फिर भी ये सपना रहेगा...मौजो के तेरे शहर में,इक मकां अपना भी होगा !!




हम है इस "अभिनव" जगत में,"रौशन" यहाँ है जिंदगानी'ख़ुशी ने कर लिया है रुख़ तेरा
मेरी क्यों लुट गयी जवानी ???


पर तुझे तो मेरे साथ चलना ही होगा
क्योकि मेरे सिवा कोई तेरा अपना ना होगा
और तब मौजों के तेरे शहर में
इक मकां अपना भी होगा...




उम्मीद की इक रोशनी दिखी है
प्यार तेरे भी दिल में छिपी है
आसमां है गर मंजील मेरा
तो साथ तुझे भी उड़ना ही होगा
तब मौजों के तेरे शहर में
इक मकां अपना भी होगा...